बादल काका

बादल काका, बादल काका
तुम मुझको बतला दो
कहाँ से पानी भर-भर लाते
ये मुझको समझा दो।।

ऊपर नभ है नीचे धरती
बीच में तेरा वास है
छुट-पुट दिखते कभी-कभी
कभी सभी का साथ है।।

चाहूँ उड़ना संग मैं तेरे
आसमान की सैर को
बंजर सी लगती है धरती
छेड़ा सबने कुदरत को।।

बिखरे रहते गगन में ऊँचे
मदमस्त हवा संग ले उड़ते
कड़क -कड़क कर शोर मचाते
 जलधारा बन हो गिरते।।

काले भूरे रूप अनोखे
 अठखेली तुम सब करते
माँ कहती मानसून आ गया
जब गर्मी में हम तपते।।

सच में जीवनदाता बनकर
हरियाली तुम हो लाते
अगर समय में घन न आएँ
मुश्किल में हम फँस जाते।।

रचयिता
ज्योति अग्निहोत्री,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय शेखनापुर घाट,
विकास खण्ड-गोसाईंगंज,
जनपद-लखनऊ।

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