प्रारम्भिक शिक्षक
माँ की गोद से, पिता के हाथ में,
भाई - बहिन, दादा-दादी के सानिध्य में।
था परिवार की छाँव में, अपनों के साथ में,
सुरक्षित महसूस करता, अपनों के प्यार में।
अचानक टन-टन की आवाज ने,
मिलवा दिया, एक अनजान से।
प्रारम्भ में डरा, मैं ख़ौफ से,
धीरे-धीरे मिलता गया, मैं रौब से।
शनैः -शनैः बीज से नवांकुर बनाया,
अंकुर को स्वज्ञान से पोषित किया।
अक्षरों की लताओं से प्रारम्भ कर,
ज्ञान की बेल सा बनाया।
माता-पिता के बाद उनको,
जीवन में सबसे महत्वपूर्ण पाया।
नन्हें-नन्हें पौधों को परिश्रम के,
जल से मैंने सींचते पाया।
कभी क्रोध को छुपाकर,
गले से भी लगाया।
फिर नन्हें-नन्हें हाथों को पकड़,
पेंसिल से लिखना सिखाया।
सफलताओं की सीढ़ी चढ़,
फलों से मैं लदता रहा।
जड़ों को सींचा जिसने मेरे,
वो सदा जीवन में साथ रहा।
वो बचपन का अनजान मेरा,
जाना पहचाना सा बन गया।
बीज से जिसने वट वृक्ष बनाया,
प्रारम्भिक शिक्षक सदा याद आया।
प्रारम्भिक शिक्षक सदा, साथ रहा,
उठना बैठना, अनुशासन सिखाया।
टन -टन घंटी की आवाज ने,
नियमबद्ध मुझे बनाया।
जिन अक्षरों को लिखकर,
भाग्य पर आज, अपने इठलाता।
हर अक्षर के साथ ऋणी हूँ मैं,
जिसने मुझे प्रारम्भ में सिखाया।
सम्पूर्ण शिक्षक जगत का वंदन।
जिनके तपो ज्ञान के प्रयासों से,
बालमन की बगिया खिल उठती,
सुगन्ध फैलती प्रयासों से।
रचयिता
सन्नू नेगी,
सहायक अध्यापक,
रा0 उ0 प्रा0 वि0 सिदोली,
विकास खण्ड-कर्णप्रयाग,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।
भाई - बहिन, दादा-दादी के सानिध्य में।
था परिवार की छाँव में, अपनों के साथ में,
सुरक्षित महसूस करता, अपनों के प्यार में।
अचानक टन-टन की आवाज ने,
मिलवा दिया, एक अनजान से।
प्रारम्भ में डरा, मैं ख़ौफ से,
धीरे-धीरे मिलता गया, मैं रौब से।
शनैः -शनैः बीज से नवांकुर बनाया,
अंकुर को स्वज्ञान से पोषित किया।
अक्षरों की लताओं से प्रारम्भ कर,
ज्ञान की बेल सा बनाया।
माता-पिता के बाद उनको,
जीवन में सबसे महत्वपूर्ण पाया।
नन्हें-नन्हें पौधों को परिश्रम के,
जल से मैंने सींचते पाया।
कभी क्रोध को छुपाकर,
गले से भी लगाया।
फिर नन्हें-नन्हें हाथों को पकड़,
पेंसिल से लिखना सिखाया।
सफलताओं की सीढ़ी चढ़,
फलों से मैं लदता रहा।
जड़ों को सींचा जिसने मेरे,
वो सदा जीवन में साथ रहा।
वो बचपन का अनजान मेरा,
जाना पहचाना सा बन गया।
बीज से जिसने वट वृक्ष बनाया,
प्रारम्भिक शिक्षक सदा याद आया।
प्रारम्भिक शिक्षक सदा, साथ रहा,
उठना बैठना, अनुशासन सिखाया।
टन -टन घंटी की आवाज ने,
नियमबद्ध मुझे बनाया।
जिन अक्षरों को लिखकर,
भाग्य पर आज, अपने इठलाता।
हर अक्षर के साथ ऋणी हूँ मैं,
जिसने मुझे प्रारम्भ में सिखाया।
सम्पूर्ण शिक्षक जगत का वंदन।
जिनके तपो ज्ञान के प्रयासों से,
बालमन की बगिया खिल उठती,
सुगन्ध फैलती प्रयासों से।
रचयिता
सन्नू नेगी,
सहायक अध्यापक,
रा0 उ0 प्रा0 वि0 सिदोली,
विकास खण्ड-कर्णप्रयाग,
जनपद-चमोली,
उत्तराखण्ड।

अति सुंदर👌👌👌
ReplyDeleteBahut Sundar rachana mam
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