गुरु
मैं टुकड़ा मिट्टी का कोई निराकार,
जो दे आकार मुझे, तू वो कुम्हार।
मैं बंजर सी कोई ज़मीं खाली,
जो बोए ज्ञान का बीज मुझमें, तू वो माली।
मैं अज्ञानता में घिरी कोई नैय्या,
जो लाए किनारे तक मुझे, तू वो खेवैय्या।
मैं स्वार्थी तेरे धन(ज्ञान) का ग्रहणी,
निस्वार्थ लुटाए जो अपना धन मुझपे, तू वो उपकारी।
मैं अंधेरों से घिरा कोई आज,
रोशन करे जो मेरा कल, तू वो प्रकाश।
मैं भटका हुआ सा कोई पथ,
जो सही दिशा दे मुझको, तू वो पथप्रदर्शक।
दिलाया मुझे इस समाज में सम्मान,
उठा के चल सकूँ सर मैं, तू वो मान।
कभी प्यार से, कभी फटकार से मुझे सिखाया,
तपाके कुंदुन को जिसने सोना बनाया, तू वो सुनार।
मेरे सपनों को मिली जिससे पहचान,
उड़ सकूँ जिसमें मैं, तू वो आसमान।
क्या -2 करूँ मैं अपना तुझपे अर्पण,
सँवारा जिसने मुझे, तू वो दर्पण।
मेरे हर एक हुनर का है जो कद्रदान,
रहूँ सदा जिसका कर्ज़दार मैं, तू वो भगवान।
जो दे आकार मुझे, तू वो कुम्हार।
मैं बंजर सी कोई ज़मीं खाली,
जो बोए ज्ञान का बीज मुझमें, तू वो माली।
मैं अज्ञानता में घिरी कोई नैय्या,
जो लाए किनारे तक मुझे, तू वो खेवैय्या।
मैं स्वार्थी तेरे धन(ज्ञान) का ग्रहणी,
निस्वार्थ लुटाए जो अपना धन मुझपे, तू वो उपकारी।
मैं अंधेरों से घिरा कोई आज,
रोशन करे जो मेरा कल, तू वो प्रकाश।
मैं भटका हुआ सा कोई पथ,
जो सही दिशा दे मुझको, तू वो पथप्रदर्शक।
दिलाया मुझे इस समाज में सम्मान,
उठा के चल सकूँ सर मैं, तू वो मान।
कभी प्यार से, कभी फटकार से मुझे सिखाया,
तपाके कुंदुन को जिसने सोना बनाया, तू वो सुनार।
मेरे सपनों को मिली जिससे पहचान,
उड़ सकूँ जिसमें मैं, तू वो आसमान।
क्या -2 करूँ मैं अपना तुझपे अर्पण,
सँवारा जिसने मुझे, तू वो दर्पण।
मेरे हर एक हुनर का है जो कद्रदान,
रहूँ सदा जिसका कर्ज़दार मैं, तू वो भगवान।
रचयिता
हिना सिद्दीकी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय कुंजलगढ़,
विकास खण्ड-कैंपियरगंज,
जनपद-गोरखपुर।

Nice mam keep it up
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