गुरु महिमा

गुरु महिमा अनगिनत हैं, वर्णन नहीं हो पाय,
गुरु समक्ष स्वयं ईश्वर भी, नमत लघु हो जाय।
ज्यों कुम्हार कच्ची माटी, गढ़ नव मूर्ति बनाय,
कुशल शिल्पी बन परख गुण, शिष्य गढ़े दिनराय,
ज्यों माली सींच नित पौधा, कर देखभाल बढ़ाय।
पथ प्रदर्शक बन आगे चल, उत्तम राह दिखाय,
काँटें चुन-चुन राह के, मंजिल सुलभ बनाय।
राह दिखाय बन सारथी, लक्ष्य हासिल करवाय,
पुष्प चुन-चुन बीन कंटक से, उत्तम हार बनाय।
शुद्-विशुद्ध, पाप-पुण्य बताय, आत्मा शुद्ध करवाय।
ऐसे गुरु महान जग माही, अति दुस्तर मिल पाय,
भवसागर जो पार कराय, जीवन सफल बनाय।
सादर वन्दन अभिनन्दन कर, सब जग शीश नवाय,
विनती एक ही मन सबहि के, आशीष सदा सब पाय....

रचयिता
सुप्रिया सिंह,
इं0 प्र0 अ0,
प्राथमिक विद्यालय-बनियामऊ 1,
विकास क्षेत्र-मछरेहटा,
जनपद-सीतापुर।

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