रोजगार या निर्वाह

रोजगार या निर्वाह जीवन का, क्या  नाम दें इसे।
दुखती  रूह,  पर  बाँधे कमर  पर सुकुमार।

 वह  तोड़ रही  पत्थर।।
नींद में   खोया,  सपने संजोता  यही पूछ रहा,
रोजगार  या निर्वाह क्या  नाम  दें इसे।
आह  तक  न  निकलती  कभी, 
वक्त  ही  नहीं  पास  न थाली  न ताली  बजाने  का।
दिन से  हफ्ते  और  महीने  निकल  गए।
पर एकटक कर्तव्य  पथ  पर हाथ।
पत्थर  से  मूरत व बंजर  को  ऊसर  बनाने  को।
ये नहीं  कर  पाते अपनी  आवाज  बुलन्द।
बस निहारते  सुबह  का उगता  व शाम  का  ढलता  सूरज।।
खुशनसीब  समझ, पीठ पर  बँधा यही  पूछता।
रोजगार  या  जीवन निर्वाह  क्या  नाम  दें  इसे।
 महत्वाकांक्षा   इनमें  भी कम  नहीं।
सपने  अपार  होंगे  आँखों  में।
पसीने  में  खारापन  कुछ  ज्यादा  है।
 तभी तो झेल  लेते  हर  दर्द  हर  मार  सैनेटाइज  कर  खुद  को।
 रोजगार  रोज  से  शुरू  हो  रोज  पर  खत्म  हो  जाता।
आज  फिर रोजी  मिलेगी  कि मैं  रहूँगा  बेरोजगार।
तब  तक  सिर  चढकर  सूरज  देता  एक  और  रोज इन्हें।
और  मिलता  फिर  वही  रोजगार

सुकुमार  सकुचाता, मुस्काता  कहता  ये  कैसा  रोज़गार।
ये  कैसा  रोजगार।
अब  कुछ  काया  बड़ी हुई,
बैठा  चींटी को देख  रहा।
काम  नहीं छोटा  कोई  भी,
बस  मेहनत  से  कदम  बढा़।
सबका  अपना  लक्ष  प्रबल  हो, इच्छा  शक्ति  कम  ना  हो।
क्या  है  जब  ये  कष्ट  बड़ा तो, अन्त  में  होगा  महल  खड़ा।
काम नहीं  छोटा  कोई  भी, सब  हैं  कश्ती  के  नौकाकार।  पार लगा ही लेंगे  खुद  को,  कर लेंगे  जब  श्रम  अपार।
  हाथ  उठाकर दोनों, माँ का  आँचल  लहराता।
खुद  का  भाग्य  लिखूँगा  मैं कुछ ऐसी  अलख  जगाऊँगा।
 रोजगार  ना भी  हो तो  क्या  स्वरोजगार  अपनाऊँगा  स्वरोजगार  अपनाऊँगा।।

रचयिता
बीना जोशी,
सहायक अध्यापक,
राजकीय प्राथमिक विद्यालय रूगड़ी,
विकास खण्ड-गंगोलीहाट,
जनपद-पिथौरागढ़,
उत्तराखण्ड।

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