माँ मुझको पढ़ना सिखा दे

माँ मुझको पढ़ना सिखा दे,
स्कूल का काम याद करा दे।
बार-बार दोहरा कर फिर पुनः भूल मैं जाता हूँ,
सब बच्चे हैं मुझे चिढ़ाते,
भोन्दू-भोन्दू मुझे बुलाते।
कितना याद करूँ मैं हिंदी,
भूल ही जाता कहाँ है बिंदी।
बोल-बोल के अटक मैं जाता,
चित्रकारिता सबकी प्यारी,
आम भी मुझसे बन नहीं पाता।
मैडम जी भी खूब पढ़ातीं,
भर-भर ब्लैकबोर्ड लिखवातीं।
फिर भी मुझको समझ ना आये,
कोई तो होगा बता उपाय।
बच्चों का यूँ मुझे छेड़ना,
टीचर जी का गुस्सा करना,
मन नहीं करता स्कूल को जाना।
टीचर जी कहती हैं हमारी,
पहली शिक्षिका माँ है तुम्हारी।
माँ अब मुझको बचा ले इनसे,
डर लगता है छिपा ले इनसे।
         बहुत हो गया बेटा जी
शांत रहो अब सुन लो भी...,
स्कूल जाना तुम्हें भी भाये,
एक सुझाऊँ मैं उपाय....,
चलूँगी कल साथ तुम्हारे,
 टीचर जी से बात करुँगी,
करें निदान कमियों का तुम्हारे,
उपचारात्मक शिक्षण तुम पर अपनाएँ।
खुशहाली से तुम्हें पढ़ाएँ।

रचयिता
मीरा कन्नौजिया,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय हरखपुर,
विकास खण्ड-सिकरारा, 
जनपद-जौनपुर।

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