बेटी बचाओ

बिटिया का घर के चौक -आँगन में फुदकना
           उसका चहकना, खिलखिलाना, हँसना
घर के कोने-कोने को गुलज़ार  करना
     बरबस सबको अपने सम्मोहन से बाँध जाना
 साँसों के  ताने -  बाने को जीवंत बनाना
         बिटिया है अनंत ख़ुशियों का खजाना॥
पर, आज उसके अस्तित्व पर संकट है गहराया
         अपने जीवन के लिये उसने हाथ है फैलाया
चाहती  हूँ मैं भी इस धरती पर आना
       मुझको माँ तू ना अपनी कोख में मारना
मेरे लिये माँ तू खुद अपना हौंसला बढ़ाना
       मुझको तू ये सुन्दर संसार दिखाना॥
अपने वज़ूद को बचाने खुद से भी लड़ना
        किसी के  बहकावे में मत आ जाना
चाहे कोई कितना भी बनाये वंश का बहाना
       इंसानी दरिंदों से मेरे संग खुद को भी बचाना
माँ तू टूटकर  /हताश होकर न बिखरना
        माँ तू आज मुझे बचाकर इंसाफ दिलाना॥
मुझे बचाकर अपना फ़र्ज़ माँ तू निभाना
       सृष्टि की अनमोल धरोहर को यूँ ही ना सुलाना
दुनिया वालों तुम भी इस पर गौर करना
         क्या उचित है मुझको यूँ गर्भ में मारना
दे दो मुझको मेरे हिस्से का आकाश का पालना
      आने दो मुझको भी करने पूरा अपना सपना॥
 
रचयिता
विमला रावत,
सहायक अध्यापक,
राजकीय जूनियर हाईस्कूल नैल गुजराड़ा,
विकास क्षेत्र-यमकेश्वर,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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