गर्व है कि मैं एक शिक्षक हूँ

मुझे गर्व है कि मैं एक शिक्षक हूँ, जिस प्रकार एक कुम्हार कच्ची मिट्टी से अपने हुनर का प्रयोग करते हुए उस मिट्टी को अपने अनुसार आकृति प्रदान करता है। उसी प्रकार बच्चों का मन भी होता है जिसे एक शिक्षक अपनी ऊर्जा लगाकर बच्चे को होनहार बनाता है, उसे एक सोचने का नजरिया प्रदान करता है। शिक्षक उसे उसके भविष्य के लिये तैयार करता है। बच्चों को सही गलत का फर्क समझाता है। कबीर दास जी कहते हैं-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पायँ
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।
कबीर दास जी ने बहुत ही सुंदर शब्दों में शिक्षक के महत्व को समझाया है।

शिक्षक होने के साथ ही हमारा समाज के प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती है। समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने में शिक्षक की अहम भूमिका होती है। परन्तु समय के साथ शिक्षक भी व्यवसायी हो गया है। हर तथ्य को हानि लाभ की दृष्टि से देखने लगा है। अमुक कार्य को करने से मुझे पुरस्कार प्राप्त होगा, दूसरे कार्य को करने से धन प्राप्त होगा इस तरह किसी भी कार्य को करने से पहले अपने हित को ध्यान में रखता है।

परन्तु मेरी सोच के अनुसार शिक्षक का कार्य निःस्वार्थ होना चाहिए, शिक्षा के उत्थान के लिये अपने प्रयासों में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहिए।
मैं यदि ईमानदारी से अपनी बात करूँ तो शिक्षा विभाग में कार्य करना मेरी पहली पसन्द नहीं था फिर भी नियुक्ति के बाद मैंने पूर्ण मनोयोग से कार्य किया। शुरुआत में नियुक्ति के समय लोग कहते कि अभी नई हो इसलिये कर रही हो उसके बाद भी मैं करती रही कालान्तर में कहा जाने लगा कि राज्य पुरस्कार या राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त करने के लिये कार्य करती हो। जब मेरे विद्यालय की छात्र संख्या मात्र 110 थी अगले सत्र में प्रयासों से बच्चे बढ़ने लगे तो मेरी ही एक सहयोगी ने कहा- चार दिन की चाँदनी फिर अंधेरी रात। फिर भी मैंने प्रयास करना नहीं छोड़ा आज 345 की संख्या है।
अब जबकि मैंने पुरस्कार के लिये आवेदन नहीं किया तो लोग पूछते हैं कार्य करने का लक्ष्य क्या है?
मैं भी सोचने लगी वास्तव में क्या लक्ष्य है ये प्रयास कहाँ जाकर रुकेंगे, स्वयं में चिन्तन मनन किया तो पाया कि मेरा एकमात्र लक्ष्य है किसी भी कार्य को यदि करो तो अपना 100 % प्रयास करो परिणाम स्वतः प्राप्त होंगे। आवश्यक नहीं कि स्वार्थवश ही कोई कार्य किये जाए। अतः मैं जो भी कार्य करती हूँ या प्रयास करती हूँ मिली हुई जिम्मेदारी को पूर्ण मनोयोग से करने का प्रयत्न करती हूँ।
मैं कभी किसी प्रोत्साहन या आकर्षण प्राप्त करने के लिये कोई कार्य नहीं करती।
अन्त में इतना ही कहना चाहूँगी कि भले ही इस विभाग में आना मेरी पसन्द नहीं थी, फिर भी मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानती हूँ कि मैं एक शिक्षक हूँ, और नन्हें-मुन्नों के भविष्य को सँवारने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ है।

लेखिका
ज्योति कुमारी,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय कोइलरा, 
विकास क्षेत्र-औराई,
जनपद-भदोही।

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