हिन्दी

कल्पवृक्ष सी हिन्दी अपनी 
शाख जिसकी सब भाषाएँ
रखे सँवारे पोषित करती
अपनी थाती सागर भरती।

देश नहीं विदेशों में भी
बजती जिसकी है शहनाई,
शब्दललित व वाच सुगमता
देवनागरी लिपी कहाई।

दोहे शबद रमैनी जिसके
हार कंठ पर हैं लटके, 
दसियों गद्य विधाएँ उसकी
महिमा पूरण हैं करते।

श्रृंगार कभी तो, वियोग रस 
इसको सुन्दर सजाने आई, 
पवित्र हैं करती मन आत्मा
इसकी मधुर-मधुर अंगड़ाई।

रस छंदों और अलंकार से
बढ़ती इसकी तरूणाई
गर्वित है इतिहास भी 
जिसकी मानस सी परछाईं।

जात धर्म हर मजहब पंथ की
जिसने की है भरपाई
बडे लाड से पाले उसने
हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई।।

रचयिता
आरती बहुगुणा,
प्रधानाध्यापिका, 
रा0प्रा0वि0 मरगाँव,
संकुल-गोदा, 
विकास खण्ड-थलीसैंण, 
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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