मेरे शिक्षक

हाँ हूँ मैं शिक्षक...
पर मेरे भीतर छिपे हुए हैं,
जाने कितने मेरे शिक्षक!!!

तभी तो,कभी माँ सी देती हूँ वर्जनाएँ....
तो कभी पिता सी कठोर हो जाती हूँ।

कभी अपने ही विद्यार्थियों के हितार्थ,
हो जाती हूँ मौन ...
कभी अपनी शिक्षिका के जैसे ही निष्ठुर बन जाती हूँ ।

कभी, किसी बात पर होती हूँ आग बबूला....
तो कभी छोटों के सम्मुख भी नतमस्तक हो जाती हूँ।

कभी दोस्तों सा विश्वास बाँटती हूँ..
तो कभी सख्ती से दंड भी सुनाती हूँ।

कभी करती हूँ हास -परिहास,
तो कभी ऊँच- नीच,
हार-जीत को लेकर,
वक्त के अनुभवों का सबक सुनाती हूँ।

पर.......इतना कुछ नहीं सीखा है
खुद से....
बहुत सारे पथ-प्रदर्शक थे मेरे भी
बचपन से।

माँ, पिता, गुरु, दोस्त, रिश्ते नाते,
अतिथि और जाने कितने संपर्क सूत्र....
कैसे-कैसे धीरे-धीरे
 आते गए जीवन में।

आज भी मेरे पग-पग पर,
मुखरित हैं.....
मेरे वो सब प्रेरक सारे।

मन से विस्मृत कब हो पाये,
शिक्षक मेरे प्यारे- प्यारे.....।

जीवन मूल्य आज भी उनके,
मुझमें रहे समाहित......
मेरे शिक्षक,
नमन आपको कोटि- कोटि है अर्पित।

रचयिता
निशी श्रीवास्तव,
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय रमपुरवा,
विकास खण्ड-बी0के0टी0,
जनपद-लखनऊ।

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