श्राद्ध

पितरों का हम देते श्राद्ध
गुजर  जाते तब आते याद।
खीर, पूरी कई सब्जी साग।
रखते उनको, करते याद।
    मगर वही जब जिंदा होते
    सबकी आँखों को खटकते
    प्यार को तब बड़ा तरसते।
    समय विभाजन में भी बँटते।
जिंदा रहते करना सेवा
उसका ही मिलेगा मेवा।
आँखों को उनकी पढ़ लेना
खालीपन उनका भर लेना।
       स्नेह, प्रेम हमेशा देना
      भूख तभी जब तक जीना।
      उसके बाद नहीं कुछ देना।
      आशीर्वाद सदा ही लेना
श्रद्धा से ही जन्मा है श्राद्ध
श्रद्धा हो तब  करना श्राद्ध।
मिलेगा पितरों का आशीर्वाद।
 बिन श्रद्धा सब कुछ बेकार।

रचयिता
अनीता ध्यानी (अनि),
प्राथमिक विद्यालय देवराना,
विकास खण्ड-यमकेश्वर,
जनपद-पौड़ी गढ़वाल,
उत्तराखण्ड।

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