ओजोन दिवस

समय नहीं अब शेष रह गया,
न प्रकृति का संहार करो।

आगे बढ़कर आओ सारे,
धरती माँ का श्रृंगार करो।

बन बैठे तुम, क्यों निरे स्वार्थी,
अरे, थोड़ा तो परमार्थ करो।

जिसने त्यागा सर्वस्व तुम्हें,
कुछ, उसके तो हितार्थ करो।

बढ़ी लालसा, भूले सब तुम
कर खुद पर तुम धिक्कार, मरो।

कुछ धैर्य धरो, अब तो ठहरो
न प्रकृति का सामर्थ्य हरो।

वृद्धि हो रही ओजोन छिद्र में,
रसायन का परित्याग करो।

परिवर्तित हो चुकी जलवायु,
अब तो जागो, कुछ शर्म करो।

संतुलित नहीं अब रहा पहले-सा,
मानव-प्रकृति का अटूट बंधन।

सब छिन्न-भिन्न कर दिया है तूने
इस कृत्य का कुछ तो, अर्थ मनो।

निज जीवन का स्मरण करो,
अपनी तृष्णा को शान्त करो।

वृक्ष, वायु, जल, धरा अमूल्य हैं,
नहीं कदापि तुम इन्हें छलो।

धन नहीं है ये, जो खर्च हुए तो,
फिर से वापस आ जाएँगे।

जो किया प्रदूषित तुमने इनको,
ये लौट नहीं फिर आएँगे।

जस करोगे तस तुम भरोगे मानव,
बाद में फिर पछता न सकोगे।

नहीं बचोगे तुम भी जीवित
जो प्रकृति से खिलवाड़ करोगे।

रचयिता
गरिमा सिंह चंदेल,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय चन्द्रवल किशनपुर,
विकास खण्ड-मैथा, 
जनपद-कानपुर देहात।

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