हिंदी को नमन
हमारे देश का गौरव, हमारी शान है हिंदी
साहित्य की कहानी है, अमिट पहचान है हिंदी।
माता है वो जननी है, हमारे दिल में है बसी
धरोहर है सृजन की, नमन करते हैं हम हिन्दी।।
हमारे मूल में हिंदी, हमारे रूप में हिंदी,
सजी है हिन्द में ऐसे, दुल्हन के माथे हो बिंदी।
कि नज़र आती है, ये हम सबके, होठों की बोलियों में,
कहीं उड़िया कहीं उर्दू, कहीं नेपाली भी हिंदी।।
कि दिनकर की कहानी है, खुसरो की पहेली है,
पंत का स्तंभ है हिंदी, मीरा की सहेली है।
कि बच्चन की मधुशाला, सुभद्रा की ये ममता है,
सभी कवियों की वाणी है, सृजन की भाषा है हिंदी।।
कि हिन्द के वासी हैं हम सब, हिन्दोस्तान हमारा
कभी न नाम था जिसका उसको भी सँवारा है।
न होना दूर तुम इससे, न मिटने देना इसको तुम
हिंदी ने ही तो हम सबको, माँ - सा प्यार दिलाया है।।
कि अपने शब्द गीतों से, हिंदी के नाम करती हूँ
अर्पित भावना मेरी, इसी का ध्यान करती हूँ
सभी भाषाओं की जननी, प्रेम का भाव है हिंदी
हिन्द ही देश है मेरा,उसे प्रणाम करती हूँ।
रचयिता
प्रियंका सक्सेना,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय बैरमई खुर्द,
विकास खण्ड-अम्बियापुर, बिल्सी
जनपद-बदायूँ।
साहित्य की कहानी है, अमिट पहचान है हिंदी।
माता है वो जननी है, हमारे दिल में है बसी
धरोहर है सृजन की, नमन करते हैं हम हिन्दी।।
हमारे मूल में हिंदी, हमारे रूप में हिंदी,
सजी है हिन्द में ऐसे, दुल्हन के माथे हो बिंदी।
कि नज़र आती है, ये हम सबके, होठों की बोलियों में,
कहीं उड़िया कहीं उर्दू, कहीं नेपाली भी हिंदी।।
कि दिनकर की कहानी है, खुसरो की पहेली है,
पंत का स्तंभ है हिंदी, मीरा की सहेली है।
कि बच्चन की मधुशाला, सुभद्रा की ये ममता है,
सभी कवियों की वाणी है, सृजन की भाषा है हिंदी।।
कि हिन्द के वासी हैं हम सब, हिन्दोस्तान हमारा
कभी न नाम था जिसका उसको भी सँवारा है।
न होना दूर तुम इससे, न मिटने देना इसको तुम
हिंदी ने ही तो हम सबको, माँ - सा प्यार दिलाया है।।
कि अपने शब्द गीतों से, हिंदी के नाम करती हूँ
अर्पित भावना मेरी, इसी का ध्यान करती हूँ
सभी भाषाओं की जननी, प्रेम का भाव है हिंदी
हिन्द ही देश है मेरा,उसे प्रणाम करती हूँ।
रचयिता
प्रियंका सक्सेना,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय बैरमई खुर्द,
विकास खण्ड-अम्बियापुर, बिल्सी
जनपद-बदायूँ।

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