शिक्षक धर्म
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
भारत के बच्चे शिक्षा से,
वंचित न रह जाएँ।
प्राइवेट शिक्षक हों चाहे,
सरकारी अध्यापक।
शिक्षा का विस्तार करें हम,
घूम-घूम कर व्यापक।
कहीं देर हो जाए न ज्यादा,
जल्दी से कदम उठाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
उलझे रहे अगर हम अपने,
खुद के कामों में ज्यादा।
दृढ़ प्रतिज्ञ बन लिया नहीं,
यदि हमने अटल इरादा।
तो शिक्षा की गाड़ी पटरी से,
हो जाए न दाएँ-बाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
बस भाग्य भरोसे बैठे रहना,
दिशाहीन कर देगा।
बीज अशिक्षा का जन-जन में,
कूट-कूट भर देगा।
आओ हम शिक्षा देने की,
खोजें नई दिशाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
शिक्षा ही वह धन है जिसको,
बाँटोगे तो और बढ़ेगा।
अगर ढंग से बाँट दिया तो,
नई कहानी स्वयं गढ़ेगा।
आओ हम सब कुछ ज्यादा,
हद से आज गुजर जाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
जो काम तुम्हें सौंपा नियति ने,
उससे विमुख क्या होना।
आसान नहीं है शिक्षक बनना,
सब कुछ पड़ता है खोना।
आओ कुछ कोयलों को हम,
हीरा आज बनाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
वह मुल्क अविकसित रह जाता,
जिसके बच्चे हों अनपढ़।
अपमान बहुत सहना पड़ता है,
यदि काम हो गया गड़बड़।
आओ अपने भारत को हम,
विश्वपटल पर चमकाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
श्री राधाकृष्णन जैसे शिक्षक,
बनें प्रेरणास्रोत हमारे।
कितनी विपत्ति झेली लेकिन,
वे हिम्मत से न हारे।
आओ पाँच सितम्बर को हम,
दिल में आज बसाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
रचयिता
अरविन्द दुबे मनमौजी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अमारी,
विकास खण्ड-रानीपुर,
जनपद-मऊ।
शिक्षक धर्म निभाएँ।
भारत के बच्चे शिक्षा से,
वंचित न रह जाएँ।
प्राइवेट शिक्षक हों चाहे,
सरकारी अध्यापक।
शिक्षा का विस्तार करें हम,
घूम-घूम कर व्यापक।
कहीं देर हो जाए न ज्यादा,
जल्दी से कदम उठाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
उलझे रहे अगर हम अपने,
खुद के कामों में ज्यादा।
दृढ़ प्रतिज्ञ बन लिया नहीं,
यदि हमने अटल इरादा।
तो शिक्षा की गाड़ी पटरी से,
हो जाए न दाएँ-बाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
बस भाग्य भरोसे बैठे रहना,
दिशाहीन कर देगा।
बीज अशिक्षा का जन-जन में,
कूट-कूट भर देगा।
आओ हम शिक्षा देने की,
खोजें नई दिशाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
शिक्षा ही वह धन है जिसको,
बाँटोगे तो और बढ़ेगा।
अगर ढंग से बाँट दिया तो,
नई कहानी स्वयं गढ़ेगा।
आओ हम सब कुछ ज्यादा,
हद से आज गुजर जाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
जो काम तुम्हें सौंपा नियति ने,
उससे विमुख क्या होना।
आसान नहीं है शिक्षक बनना,
सब कुछ पड़ता है खोना।
आओ कुछ कोयलों को हम,
हीरा आज बनाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
वह मुल्क अविकसित रह जाता,
जिसके बच्चे हों अनपढ़।
अपमान बहुत सहना पड़ता है,
यदि काम हो गया गड़बड़।
आओ अपने भारत को हम,
विश्वपटल पर चमकाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
श्री राधाकृष्णन जैसे शिक्षक,
बनें प्रेरणास्रोत हमारे।
कितनी विपत्ति झेली लेकिन,
वे हिम्मत से न हारे।
आओ पाँच सितम्बर को हम,
दिल में आज बसाएँ।
आओ मित्रों हम सब अपना,
शिक्षक धर्म निभाएँ।
रचयिता
अरविन्द दुबे मनमौजी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अमारी,
विकास खण्ड-रानीपुर,
जनपद-मऊ।

Comments
Post a Comment