आशा की नई किरण

बाधाएँ आती हैं तो आएँ
इनसे तनिक भी ना घबराएँ
सुख- दुख की घनघोर घटाएँ
निशदिन घटती -बढ़ती जाएँ।

स्वयं के भीतर  दीपज्ञान से
जग को प्रकाशित करना होगा
संघर्ष -रूप    की   बाती   में
लौ बनकर ही तो जलना होगा।

दुख की बदली जब छा जाए
दुर्विचार तब घर कर जाए
जीवन भी तम से घिर जाए
कोई विचार तब सूझ न पाए।

निराशा से ही आशा का
पुनः दीप जलाना होगा
चक्र हैं सुख -दुख जीवन के
हमें स्मरण रखना होगा।

मन को धीर -गम्भीर बनाएँ
नित्य परिश्रम करते जाएँ
कर्म के पथ से विमुख न होंवे
दृढ़ संकल्प से लक्ष्य को भेदें।

 धरा से नभ छूने का हमको
स्वयं इतिहास रचना होगा
कर्म पथ को प्रशस्त करके
कर्त्तव्यनिष्ठ हमें बनना होगा।।
     
रचयिता
दीपा पाण्डेय,
प्रवक्ता संस्कृत,
राजकीय बालिका इंटर कॉलेज काकड़,
विकास खण्ड-बाराकोट,
जनपद-चम्पावत,
उत्तराखण्ड।

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