मीठी/फ़ीकी ईद

यह कैसा मातम छाया? 

है घोर अंधेरा आया। 

घर आँगन सूने कर डाले, 

काल बड़ा गहराया।।


क्षणभंगुर है यह काया, 

क्यों दिल यह समझ ना पाया। 

अपना कोई छूट ना जाए, 

यह सोच सोच घबराया।।


होली भी रंग ना पाई,

दीवाली नहीं जगमगाई।

ईद पर आँखें तरसीं,

क्यों चाँदनी ना भाई?


मिल पाए ना गले हम,

कर पाएँ ना तेरा दीद।

अपने कितने बिछड़ गए?

मीठी बन गई फ़ीकी ईद।।


प्रभु कर दो कुछ उपकार,

चल जाए ऐसी बयार।

महके जीवन यह फिर से,

मने तीज और त्योहार।।


रचयिता
हेमलता गुप्ता,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मुकंदपुर,
विकास खण्ड-लोधा, 
जनपद-अलीगढ़।



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