विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस

तर्ज-कबीर के दोहे

जल, जमीन, जंगल बिना, प्रकृति न जीवित होय,
जंगल से वन्य जीव है, जल से भी अस्तित्व होय।

जीवन हमारा अहम है, इसे बचाएँ आप,
संरक्षण हो प्रकृति का, तन्मयता के साथ।

विलुप्त होते जीव - जंतु, रक्षा की करें पुकार,
वनस्पति भी खो रही, जीवन का आधार।

प्रकृति बदले स्वरूप अपना, करे हमें हैरान,
भीषण गर्मी, सूखे जलस्रोत, बने रुप विकराल।

प्राकृतिक संसाधन की सुरक्षा, अत्यंत आवश्यक,
जागरूक हो जन इसके प्रति, ये हमारा ध्येय।

लुप्त होते हरे पौधे, ऑक्सीजन का उपजे संकट,
संरक्षण न हुआ अगर, प्राणों का आये संकट।

ग्लोवल वार्मिंग, आपदा, तापमान का यूँ बढ़ना,
प्राकृतिक असंतुलन, बन्धुओं, मुश्किल जीवन बचना।

मत काटो जंगल हे मानव, जल न करो बर्बाद,
बारिश के पानी का उपयोग, जीवन करे आबाद।

साईकल का करो प्रयोग, प्रदूषण कम हो जाए
इसी तथ्य को पूर्ण करने, 28 जुलाई को मनाएँ।

आने वाली पीढ़ी सुरक्षित और कल्याण सुनिश्चित,
"प्रकृति है अजेय" मानव, जीवन करे व्यवस्थित।

रचयिता
नम्रता श्रीवास्तव,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय बड़ेह स्योढ़ा,
विकास खण्ड-महुआ,
जिला-बाँदा।

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