प्रकृति

उपमा नहीं तेरे सौंदर्य की, हे प्रकृति मोक्षदायिनी।
पाता मनुज सानिध्य में तेरे, सुखद शांति अनपायिनी।।
ये वसुधा, विटप, व्योम, नीर, उदधि, आपगा, निर्झर, समीर।
तेरे ही अतुलित रूप हैं, हरते सकल जग के ये पीर।।
हम हैं ऋणी हे माँ तेरे, महिमा तेरी अपार है।
कारण है तू बुद्धि तत्व का, तू ही परम् ओमकार है।।

 तू सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, स्थूल से भी स्थूल है।
 होगी नियंत्रित तू कभी, विज्ञान की ये भूल है।।
 जीव-जंतु ये सभी, भिन्न प्रकार की प्रजातियाँ।
 मार्तण्ड, मयंक, तारिका, नव ग्रहों की झाकियाँ।।
 हिम्, पठार, वन, अभ्यारण्य, गगनचुम्बी चोटियाँ।
 कितना वर्णन मैं करूँ, तूने क्या-क्या नहीं दिया।।

उज्ज्वल सा प्रमान, महकी हुईं ये विभावरी।
बारिश की ये फुहार, धूप है जो खरी-खरी।।
तू सभी में विद्यमान, तुझमें सब समाया है।
लेखनी भी क्या-क्या लिखे, अनुराग लिख न पाया है।।
स्वार्थ के हो वशीभूत हम, कर रहे नादानियाँ।
तेरे विरुद्ध कृत्य कर, बो रहे परेशानियाँ।।

तेरे विनाशक रूप के, हम ही जिम्मेदार हैं।
तू तो है दयामयी, सबकी पालनहार है।।
नर की असीमित जरूरतें, उसको ही डुबो रहीं।
ते ये धरोहरें, शनै:-शनै: न्यून हो रहीं।
है समय हे मनुज, अब भी तू सचेत हो।
संरक्षित रहे प्रकृति करता चल जो संभव हो।।

रचयिता
डॉ0 अनुराग पाण्डेय,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय औरोतहरपुर,
विकास खण्ड-ककवन,
जनपद-कानपुर नगर।

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