दीपक आलोकित रहें सदा
मन का अंधकार मिटा सके
एक ऐसा दीप जलाया जाए
अन्तस तम को दूर कर सके
ऐसी दीपावाली मनाई जाए
कृत्रिमता की चादर ओढ़
दीपावली मनाई जाती है
हर वर्ष अंधकार दूर करने को
बड़ी जुगत लगाई जाती है
बाहरी चमक-दमक की धमक में
अंधकार कहाँ दिखाई देता है
कानफोड़ू पटाखों की आवाज में
अट्टाहस उसका न सुनाई देता है
अंदर के घने अँधेरे से ही
बाहर अंधकार पसरता है
बाहर कितना भी अँधेरा हो
कुछ न बिगाड़ सकता है
दीपक आलोकित रहे सदा
आओ, ऐसे प्रयास करें हम
स्वाध्याय, अभिलेखीकरण से
ज्ञान वृद्धि करते रहें हम
जीवन जगमग-जगमग हो
ऐसी रोशनी से सब नहा लो रे
कलुषता मिट सके मन की
ऐसी दीपावली मना लो रे
रचयिता
प्रतिभा भारद्वाज,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यामिक विद्यालय वीरपुर छबीलगढ़ी,
विकास खण्ड-जवां,
जनपद-अलीगढ़।

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