समता
बेटी और नदी के जीवन में,
देखो कितनी समता है।
प्रेम और वात्सल्य भरा है
उर में निर्झर ममता है।
पर्वत अंचल की नदिया,
ज्यों पिता के घर में बेटी है।
अल्हड़, चंचल होतीं दोनों,
रहती हँसती खिलती हर पल।
यौवन की दहलीज पर आकर,
सौम्य रूप ले लेतीं दोनों।
शांत, सरल और परोपकार में,
अपना जीवन जीतीं दोनों।
वृद्धावस्था की दहलीज पर,
दोनों इतना थक जाती हैं।
नदिया की तरह नारी भी,
कितनी धाराओं में बँट जाती है।
अपने घर संसार में नारी,
इसी प्रकार समा जाती है।
जैसे नदियाँ थककर,
सागर के आगोश में खो जाती हैं।
रचयिता
शालिनी शर्मा,
सहायक अध्यापक,
राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय छापुर,
विकास खण्ड-भगवानपुर,
जनपद-हरिद्वार,
उत्तराखण्ड।

बहुत ही सुन्दर रचना महोदया !
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