डटे रहो
क्यों निराश होते हो तुम,
कर्त्तव्य-मार्ग पर डटे रहो।
तुम शिक्षक हो शिक्षा से,
हरदम-हरपल सटे रहो।
हर बालक में कुछ न कुछ,
है विशेष यह मानो तुम।
क्या तुम उसको दे सकते हो,
इसको भी पहचानो तुम।
कोई अकड़ न हो तुममें,
तुम ज्ञान से अपने पटे रहो।
क्यों निराश होते हो तुम,
कर्तव्य-मार्ग पर डटे रहो।
बाधाओं का मकड़जाल,
राह तुम्हारी रोकेगा।
कोई अज्ञानी भी तुमको,
कभी-कभी तो टोकेगा।
लेकिन तुम बढ़ते जाना,
इन सब बातों से कटे रहो।
क्यों निराश होते हो तुम,
कर्तव्य-मार्ग पर डटे रहो।
खींची हुई लकीर तुम्हारी,
कोई मिटा न पाएगा।
आने वाला हर राही,
चलकर उस पर ही जाएगा।
कभी नहीं कोई चाहेगा,
तुम अपनों में ही बँटे रहो।
क्यों निराश होते हो तुम,
कर्तव्य-मार्ग पर डटे रहो।
मिट्टी के लोंदे ही तुमको,
मिलेंगे हरदम राहों में।
तुम ढाल के उनको रख देना,
इस समाज की बाँहों में।
तुम समाज के हो निर्माता,
इसको भी तुम रटे रहो।
क्यों निराश होते हो तुम,
कर्तव्य-मार्ग पर डटे रहो।
तुम विकास के हो पोषक,
दुर्गुणों के तुम अवशोषक हो।
तुम ही निर्माण की नींव बनाते,
नवयुग के उद्घोषक हो।
तुम शिक्षक हो शिक्षा से,
कभी नहीं तुम घटे रहो।
क्यों निराश होते हो तुम,
कर्तव्य-मार्ग पर डटे रहो।
रचयिता
अरविन्द दुबे मनमौजी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अमारी,
विकास खण्ड-रानीपुर,
जनपद-मऊ।

बहुत सुन्दर भाव और रचना
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