पत्थर

पत्थर हूँ बेजान हूँ, 

रूखा हूँ निराकार हूँ,

तराश लिया गया तो अनमोल हूँ,

वरना जमीं पर पड़ा लाचार हूँ

पर खुद अपनी नजरों में साकार हूँ


तुझसे मेरी वो पहली मुलाकात।

कैसे बताता अनुभव की बात।।

तेरी नजरें ना थी जमीं पर कहीं।

बेजुबाँ हूँ बताना मेरे बस में नहीं।।

ठोकर देकर खामोशी से तुझे।

चलने का सबक सिखलाया।।


लड़ने लगे सहोदर जहाँ पर।

विश्वास था टूटा वहाँ पर।।

जब नीयत पर शक हावी होने लगा ।

नफरतों का सिलसिला तब बढ़ने लगा।।

खेतों के बीच खड़ा होकर अटल।

याद कर! मैंने ही फैसला करवाया।।

 

पत्थर सा जीवन पत्थर से ज़ज़्बात।

दु:खों से भरी पत्थर सी निष्ठुर रात।।

खिलाए भी वो पत्थर वाला भात।।

पत्थर की दीवारें पत्थर सी बात।

पत्थरों से इंसान पथरीले सवालात।  

पत्थर बरसाए पथरीले ख़्यालात।।


ज़ज़्बातों को पत्थर ना बनने देना।

मानव हो! मानवता रहने देना।।

जिस दिन ये दिल पत्थर हो जाएगा।

तू फिर कैसे मानव कहलाएगा?


बस मुझे इतना ही कहना।

जब भी देखो मुझे यह ध्यान रखना।।

चार पत्थर सजकर हमेशा,

घर या मन्दिर बनाते हैं।

वहीं चार पत्थर लड़कर,

श्मशान कहलाते हैं।।

                                                     

रचयिता
रमेश चंद्र जोशी(सत्यम जोशी),
सहायक अध्यापक, 
रा0 प्रा0 वि0 बैकोट,
विकास खण्ड - धारचूला,
जनपद - पिथौरागढ़,
उत्तराखण्ड।

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