182/2025, बाल कहानी- 03 नवम्बर
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 182/2025
03 नवम्बर 2025 (सोमवार)
#बाल_कहानी - #लेन_देन
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राजेश अच्छे खाते-पीते घर का बच्चा था। दादाजी की दुकान और पिताजी की अनेक गाड़ियों का कारोबार था। लोग 'सेठ जी-सेठ जी' कहकर उनको ससम्मान पुकारते और उनके सम्मुख नतमस्तक से रहते। गाँव-पड़ोस के लोग हर छोटे-बड़े काम के लिए उनके पास आते और उनकी दुकान-गाड़ियों से सामान खरीदना, ढोना, आना-जाना कर उन्हें और अधिक मालामाल करते रहते।
स्कूल समय से पूर्व व छुट्टी के बाद राजेश भी अब दादा जी का दुकान में हाथ बँटाने लगा और धीरे-धीरे व्यापार की बारीकियाँ सहज ही जानने-समझने लगा। अक्सर जैसा कि व्यवसाय में होता है, "रूपये दो, सामान लो।" विनिमय के इस प्रकार को सामान्य शब्दों में लेन-देन कहा जाता है, का नन्हे व्यवसायी राजेश पर कुछ अधिक ही असर पड़ा। वह विद्यालय में भी अन्य गरीब बच्चों की सहायता के लिए इस सूत्र को चरितार्थ करने लगा। अधिकांशतः निम्न आर्थिक स्थिति के बच्चे जब उससे पेन, पेन्सिल या काॅपी चाहते तो वह उसके बदले उनसे फल या अन्य स्थानीय उत्पादों की माँग करता और बदले में उनकी इच्छित वस्तु उन्हें देता। "बस अपन तो लेन-देन ही करेगा, बस अपन तो...।" यह उसका तकिया-कलाम सा बन गया और अपनी समृद्धि का प्रदर्शन-सा करता। अन्य बच्चे उसे देख सहम से जाते।
समय अपनी गति से बढ़ा । अब राजेश उच्च शिक्षा के लिए शहर चला गया और उसके कुछ स्कूली साथी गाँव से थोड़ा बहुत पढ़-लिखकर इसी शहर में आकर नौकरी करने लगे थे।
एक बार शहर में घूमते हुए उसके पिताजी का भयानक ऐक्सीडेंट हो गया, जिसमें उसके पिताजी को गम्भीर चोटें आईं। उन्हें पिचकी हुई गाड़ी से बमुश्किल निकाल पुलिस वालों ने अस्पताल में भर्ती करवा दिया और राजेश को सूचना भेज दी। आनन-फानन में राजेश अस्पताल पहुँचा तो देखा, पिताजी खून से लथपथ पलंग पर बेहोश पड़े हैं और डाक्टरों ने उनकी जान बचाने के लिए तत्काल खून की माँग कर ऑप्रेशन के लिए उससे कहा। अकेला पिता के पास अवाक्-सा खड़ा राजेश कुछ समझ नहीं पा रहा था कि तभी उसे चाय बाँटते हुए अपने पड़ोसी गाँव का कुशाल दिखाई दिया जो अस्पताल के कम्पाउन्ड में चाय की दुकान खोलकर अपना गुजर-बसर कर रहा था। 'कुशाल..कुशाल' का तीव्र आर्तृ स्वर अनायास ही उसके मुँह से निकल पड़ा। जानी-पहचानी सी आवाज सुन कुशाल राजेश की ओर मुड़ा तो उसे देखते ही पहचान गया, "अरे राजेश! यहाँ कैसे, क्या हुआ?"
"पिताजी का ऐक्सीडेंट हो गया है, बहुत खराब हालत है। डाक्टरों ने तुरन्त खून का प्रबन्ध करने को कहा है। क्या करूँ यार! कैसे होगा कुछ समझ नहीं आ रहा?"
"अरे धीरज रख, मैं अभी प्रबन्ध करता हूँ ।" कहकर ढाढस बँधाते हुए कुशाल ने फोन कर गाँव पडोस के दो-तीन लड़के अस्पताल में बुला लिए। उनमें से दो लोगों का खून लेकर डाक्टरों ने राजेश के पिता का सफल ऑप्रेशन कर दिया। सभी लोगों ने अब राहत की साँस ली।
आगे बारी-बारी से सभी लोग राजेश के साथ उसके पिता की देख-भाल करने लगे। सभी के प्रयासों व सेवा के फलस्वरूप राजेश के पिता को एक माह बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। राजेश ने सभी साथियों को 'धन्यवाद' देते हुए उन्हें सहायता के बदले धन देना चाहा, जिसे सभी ने लेने से इन्कार कर दिया। अब पिता को घर ले जाते हुए राजेश को लेन-देन के असली मायने याद आने लगे थे। बीते हुए स्कूली दिनों का तकिया-कलाम उसे आज धिक्कारता-सा जा रहा था।
संस्कार संदेश - लेन-देन केवल स्वार्थ तक सीमित नहीं होना चाहिए। कभी-कभी हमें स्वार्थ से ऊपर उठकर भी सोचना चाहिए और वही सही समय पर काम आता है।
कहानीकार-
#दीवान_सिंह_कठायत (प्र०अ०)
रा० आ० प्रा० वि उडियारी बेरीनाग
✏️संकलन
टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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