197/2025, बाल कहानी- 22 नवम्बर

#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 197/2025
*22 नवम्बर 2025 (शनिवार)*
#बाल_कहानी - #किताब_कौतिक
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"माँ..माँ! आज सर हमें किताब कौतिक ले जाने वाले हैं। शाम को थोड़ी देर से घर पहुँचेंगे। सर बता रहे थे।" 
" हैं कौतिक! कहाँ लगा है यह कौतिक? आजकल तो आसपास कोई मेला नहीं होता।"   
"पता नहीं, कहीं लगा होगा। हमें ले जा रहे हैं सर। तुम तो मुझे कहीं नहीं ले जाती हो।" ‌कहते हुए कक्षा चार में पढ़ने वाला सुनील व्यग्र-सा होते हुए जल्दी-जल्दी तैयार होने लगा।
माँ ने भी बच्चे की उत्सुकता देख झटपट कलेवा तैयार कर दिया। सुनील ने हरी मिर्च, पुदीना व लहसुन के पत्तों को एक साथ पीसकर बनाए गए चटपटे नूण को तस्तरी में रखकर उसे रोटी से लगाया। ताजा बनी छांछ के साथ रोटी खाई। तब तक उसका साथी राहुल तैयार होकर वहाँ पहुँच चुका था। सुनील और राहुल दोनों चहकते हुए स्कूल की ओर चल दिए। 
सुनील की माँ अब भी सोचती जा रही थी, "आँखिर कहाँ का कौतिक होगा ये? बेरीनाग का कौतिक, थल का कौतिक? उतरैणी कौतिक का नाम तो देखा-सुना है, पर किताब कौतिक नाम? वह भी पहली बार सुन रही है।" 
उधेड़बुन में फँसी सुनील की माँ राहुल की मम्मी से यह जानने उसके घर की ओर चल दी। जहाँ उसे पता चला कि सर बच्चों को बेरीनाग में लग रहे किताबों (पुस्तकों) के मेले में ले जा रहे हैं। परन्तु पुस्तकों के मेले में बच्चों का क्या काम? आदि-आदि प्रश्न अब भी सुनील की माँ के मन को मथ रहे थे। 
सभी बच्चों को अपनी गाड़ी में बिठाकर कठायत सर किताब कौतिक में पहुँचे। वहाँ पहुँचकर बच्चे भी आश्चर्य में पड़ गए। यहाँ तो कौतिक सा कुछ भी नहीं? जहाँ देखो किताबों से सजी दुकानें और किताबों को उलट-पुलट रहे बच्चे व लोग। एक बड़ा-सा मंच और टी० एल० एम से सजे कुछ पण्डाल। जीवन में पहली बार ऐसा नजारा देख लगभग सारे बच्चे चकित थे। 
बच्चों को सर द्वारा आवश्यक हिदायत देते हुए किताबों से सजी दुकान पर ले जाकर किताब छाँटने-पढ़ने को कहा। बच्चे अपनी-अपनी पसन्द की कहानी देखने के लिए पुस्तकों पर टूट पड़े और जल्दी-जल्दी छाँटकर उन्हें पढ़ने में लीन हो गए। आज उनका मन सारी किताबों को एक साथ जी भरकर पढ़ने का हो रहा था। किताबों का ऐसा समन्दर पहली बार ही देखने को मिला था उन्हें। जहाँ पहले वह कौतिक में खूब खाने-पीने, खिलौने लेने व झूले-चरखी पर मस्ती करने की सोच रहे थे, वहीं अब वो सब भूलकर किताबों में गोता लगा रहे थे। इसके बाद सर उन्हें टी० एल० एम० स्टाल पर ले गये। जहाँ विभिन्न प्रकार के खिलौने व कई चीजें सजी हुई थीं, जो खेलते या गति करते हुए कुछ न कुछ सिखा रही थीं। स्टाल प्रभारी द्वारा सर व बच्चों को उन सभी की विस्तृत जानकारी देते हुए ज्ञानवर्धन कराया गया। खेल-खेल में इतनी सारी जानकारी सीख बच्चे स्वयं अचम्भित थे। तभी उन्हें समोसे चाकलेट बिस्कुट वितरित किये गए, जिन्हें उन्होंने चाव से खाया और निकट खड़े टैंकर के नल से जी-भरकर पानी पिया। 
अब तक अन्य कई स्कूलों के बच्चे वहाँ पहुँच चुके थे। थोड़ी देर में भारी भीड़ जमा हो गई। अब मंच पर प्रोग्राम शुरू हो चले थे। सभी विद्यालयों के बच्चों ने बारी-बारी से अपने-अपने प्रोग्राम प्रस्तुत किए, जिससे मनोरंजन के साथ ही नये गाने, डांस स्टेप व बोलने का अन्दाज बच्चों को पता चल रहा था। 
अपराह्न सभी बच्चे प्रफुल्लित मन से सर के साथ वापस अपने गाँव में पहुँचे। सारे अभिभावक बच्चों से मेले का हाल जानने को उत्सुक थे। बच्चों द्वारा जब उन्हें किताब कौतिक का हाल समाचार बताया गया तो वो भी दंग रह गए। 
सुनील आज अन्य दिनों से अधिक उत्साहित दिखाई दे रहा था। उसने एक साँस में मेले में हुई तमाम गतिविधियों का वर्णन माँ के सम्मुख कर दिया और बताया कि कल वह अपने स्कूल में सर के साथ सिखाने वाले खिलौने बनाकर उन बच्चों को सिखाएगा, जो मेले में नहीं आ पाए थे।
सुनील की माँ मन ही मन सोचने लगी, "काश! बचपन में उसे भी ऐसे मौके मिले होते तो वह भी आज जरूर कुछ न कुछ होती। 

#संस्कार_सन्देश -
हमें बच्चों को लेकर पुस्तक मेलों में जरूर जाना चाहिए और वहाँ होने वाले कार्यक्रमों से कुछ सीखना चाहिए।

कहानीकार-
#दीवान_सिंह_कठायत (प्र०अ०) 
रा० आ० प्रा० वि० उडियारी बेरीनाग (पिथौरागढ)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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