कोरोना : एक जंग

ज देश क्या पूरा विश्व एक भारी विपत्ति का सामना कर रहा है। यह संकट कोरोना के नाम से अधिकांश मुल्कों में अपनी पैठ बनाये हुए है। कोरोना बीमारी एक विषाणुजनित संक्रामक रोग है जो कि बड़ी तेजी से मानव जाति का सफ़ाया करता जा रहा है। इटली में हुई सर्वाधिक मौतों में मृत लोगों की आयु अधिकांशतः 60 वर्ष से अधिक है। सभी देशों को सतर्क किया जा रहा है कि 60 वर्ष से अधिक या 10 वर्ष से कम आयु के वरिष्ठ नागरिकों व बच्चों कॆ साथ अधिक सावधानी बरती जाय क्योंकि इनके अंदर रोगो से लड़ने की क्षमता युवा वर्ग की अपेक्षा कम होती है। वरिष्ठ नागरिक किसी भी देश का अनुभव व धरोहर होते हैं तथा बच्चे उस देश का भविष्य। भारतवर्ष गाँवो का देश है और एक बहुत बड़ी संख्या में लोग गाँव में निवास करते हैं। हम परिषदीय विद्यालय के अध्यापकों का सौभाग्य है कि हम सीधे ही भारतीय अन्नदाताओ से जुड़े हैं और उनको शिक्षित, जागरुक व सक्षम बनाने का प्रयास करना हमारी नैतिक ज़िम्मेदारी भी है। 
यदि कोरोना जैसी खतरनाक बीमारी हमारे ग्रामीण अंचल में पाँव पसार दे तो यह एक बहुत ही भयावह स्थिति होगी। अतः गाँवो को जागरुक करने तथा मजबूत बनाने में हम शिक्षक भी मदद कर भारत के आदर्श नागरिक होने का कर्तव्य निभा सकते हैं। देश के भविष्य को मजबूत बनाने के लिये, आने वाले भविष्य का, रोगों से लड़ने की क्षमता मजबूत रखना बहुत ही आवश्यक है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिये खट्टे फल, हरी सब्ज़ियाँ यानि विटामिन C का भोजन में बहुत बड़ा योगदान है। 
भोजन में इस प्रकार से विटामिन शामिल करने हेतु मैं अपने विद्यालय (उच्च प्राथमिक विद्यालय सन्गान्व 2 हसवा फ़तेहपुर) मे वर्ष 2012 से अनवरत रूप से नींबू और हरी मिर्च (दोनों ही विटामिन चले से भरपूर) का अचार बनवाकर फ़ल संरक्षण का कार्य कर रही हूँ। यह नीबू, हरी मिर्च आदि के अचार छात्रों को मिड डे मील के दौरान परोसे जाते हैं जो कि भोजन का स्वाद बढ़ाने के साथ उनके शरीर को विटामिन तथा खनिज लवण प्रदान कर रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास करने मे सहायक होते हैं चूँकि मेरे कार्यक्षेत्र में नींबू का विशाल बाग होने के कारण यह फ़ल हमें सुगमता से उपलब्ध हो जाता है और कम लागत में ही हम काफ़ी मात्रा में हम फल को संरक्षित कर, विटामिन C और खनिज लवणो को संग्रहित कर उसे बच्चों को उपलब्ध कराते हैं। यह कार्य मैं स्वयम् तथा कक्षा 6,7,व 8 के छात्र-छात्राएँ मिलकर करते हैं। इस प्रकार से छात्र-छात्राएँ अचार बनाना सीख भी लेते हैं जो कि वे एक हुनर के रूप में अपने भविष्य को संवारने में उपयोग में ला सकते हैं। यदि यह पिछले 8 वर्षों से जारी प्रयास हमारे कार्यक्षेत्र में लोगों के अंदर बीमारियों से लड़ने की क्षमता में बढ़ोत्तरी कर सके तो मैं समझूँगी कि मेरा यह प्रयास कहीं न कहीं जीवनदायी साबित हो सका है।

लेखिका
डॉ0 श्रद्धा अवस्थी, 
सहायक अध्यापिका,
उच्च प्राथमिक विद्यालय सनगाँव,
शिक्षा क्षेत्र-हसवाँ,
जनपद-फतेहपुर। 

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