प्रकृति की सर्वोच्चता

आज धरा पर विश्व पटल के मचा हुआ है हाहाकार,
मानव द्वारा स्वच्छंद रूप से किया गया है अत्याचार।
अत्याचार हुआ मुझ पर जो नहीं समझा मेरी प्रकृति,
जो है सबको बराबर देना।
अपनी-अपनी खींचातानी में फैला दी उसने विश्व में ऐसी विकृति।
जो नियम बनाए मैंने उसका कभी भी नहीं किया पालन,
परिणाम जिसका इतना भयंकर,
भुगत रहा हर जीव हर पल।
तुम चाहे जितना आगे बढ़ जाओ,
नित नए-नए आविष्कार करो,
पर मेरे बनाए नियम बंधन को,
कभी नहीं विस्मरण करो।
क्योंकि क्रोध मुझे जब आता है,
सारा जगत थर्रा जाता है।
है प्रकृति की ही इस जगत में सर्वोच्च सत्ता,
यह सब जग को सीखा जाता है।

रचयिता
प्रियदर्शिनी तिवारी,
प्रधानाध्यापिका,
संविलियन विद्यालय कुआंडीह,
विकास खण्ड-मंझनपुर,
जनपद-कौशाम्बी।

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