मानवता का बचाव

ठहरे हुए लोग
सुनसान सड़कें
भय और आशंकाओं
में डूबा समाज
सन्नाटे से भरा वातावरण
महज एक इशारा है
कि अब नहीं ठहरे
तो मानवता ठहर जाएगी
चाँद पर पताका फहराने
वाले उन्नत भाल आज झुके हैं
मंगल पर विजय पाने
को व्याकुल
मानव के हाथ आज बेबस हैं
उन्नति का दम्भ भरते
विकसित राष्ट्र से लेकर
विकास की अंधी दौड़
में शामिल होने वाले
धावक राष्ट्रों के कदम
आज लाचार हैं
जो यह कहते नहीं थकते थे
कि अभी क्या
अभी तो देखना है
वो दिन
जब इंसान की बस्ती
चाँद पर होगी
जिनको गर्व था कि हमारा
शहर कभी ठहरता नहीं
जिनको लगता था कि
हमारे से ज्यादा जरूरी
तो किसी का काम है ही नहीं
आफिस के टारगेट के बोझ
तले कराहते रिश्तों को
दुलारने का जिनके पास नहीं था वक्त
यांत्रिक जीवन जो गतिवान था
हाँफती हुई साँसों पर
आज वो सब कुछ ठहर गया है
और ये इशारा कर गया है
कि अब नहीं ठहरे
तो मानवता ठहर जाएगी
न मिसाइलें काम आ रही हैं
न हाईटेक बन्दूकें साथ निभा रही हैं
मन खुद से यह सवाल कर रहा है
बारूदों के ढेर की अहमियत क्या है?
इन पर नाज करने वालों
सच बताना,
आज इनकी कीमत क्या है?
हवा, पानी और रोटी
ही संसार को बचायेगी
भूखी मानवता
बारूद पर तो नहीं जी पायेगी
हवा को साफ रखना ही होगा
पानी को बचाना ही होगा
बारूद का ढेर नहीं
अन्न का ढेर लगाना होगा
सृष्टि के लिये जरूरी
बुनियादी जरूरतों पर ध्यान देना होगा
क्योंकि
अब भी दुर्बल यदि बुनियाद रही
तो दृश्य प्रलयंकारी होंगे
आने वाले संकट तो
इससे ज्यादा भारी होंगे
विकास की अंधी दौड़ में
ठहराव जरूरी है
थकी हुई मानवता का
बचाव जरूरी है
क्योंकि यदि अब नहीं ठहरे
तो सच में मानवता ठहर जायेगी

रचयिता
कुमार विवेक,
सहायक अध्यापक,
उच्च प्राथमिक विद्यालय पलौली,
विकास क्षेत्र-बेहटा,
जनपद-सीतापुर।

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