इंसानियत का मजहब

जाके मंदिर में अरदास कर तू ज़रा,
दिया मस्जिद में जाकर जला तू ज़रा,
दर ब दर ना भटक द्वारे कर तू अज़ान,
हर चौखट में गुरु राम रहीम आदमी।

बाँट रखा है तूने इंसानियत का मजहब,
तू न हिन्दू न मुस्लिम न सिक्ख आदमी।
बात नफरत की कोई धर्म सिखाता नहीं,
फिर क्यों दुश्मन बना आदमी - आदमी?

जिसने मजहब दुकानें सजा के रखीं,
बैरी इंसानियत का वो है आदमी।
जान ले बात इतनी सी तू नवीन,
बस मोहब्बत तू इंसान से कर आदमी।

समझें नफरत और हैवानियत का ये खेल,
इसमें पिसता है बस हर आम आदमी।
रंज आते हैं हिस्से और किस्से बनें,
सत्ता की आग में आहुति आदमी।

रचयिता
नवीन कुमार,
सहायक अध्यापक,
माडल विद्यालय कलाई,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

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