नारी तुम केवल श्रद्धा हो
जीवन के संघर्षों को झेलती,
हर वेदना स्वयं में समेटती।
एक खुशनुमा ठंडी बयार हो,
नारी तुम केवल श्रद्धा हो।
प्रेम, स्नेह, ममता की खान हो,
तुम तो मानवता की शान हो,
जीवन की अविरल धारा हो,
नारी तुम केवल श्रद्धा हो।
न बदले की कोई चाह रखती,
बस हर क्षण खुशियाँ ही भरती
सात स्वरों सी तुम संगीत हो,
नारी तुम केवल श्रद्धा हो।
तुम ही गीता तुम ही कुरान हो,
तुम ही हर सभ्यता की शान हो
निर्मल, पावन गंगा जल जैसी,
नारी तुम केवल श्रद्धा हो।
कभी दुर्गा तो कभी काली हो,
तुम अनगिनत रूपों वाली हो।
अंधेरे में आशा की किरण हो,
नारी तुम केवल श्रद्धा हो।
रचयिता
चारु मित्रा,
सहायक अध्यापक,
पूर्व माध्यमिक विद्यालय गदपुरा,
विकास खण्ड-खंदौली,
जनपद-आगरा।

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