45/2024, बाल कहानी- 14 मार्च
बाल कहानी- मित्रता
-----------------------
बहुत दिनों की बात है। सुन्दरवन जंगल में चीकू खरगोश और मीकू कछुआ रहते थे। दोनों में मित्रता थी। दोनों सुन्दर से जंगल में दूर दूर तक सैर करते। दोनों में से कोई भी अगर समय पर एक निश्चित स्थान पर न पहुँचता तो दूसरा उसे जगाने के लिए पहुँच जाता। कभी नदी किनारे चीकू खरगोश हाँक लगाता-, "अरे मीकू! आज पानी में हो रहोगे.. सैर पर नहीं चलोगे?" फिर मीकू अलसाया हुआ पानी से निकलता और दोनों मित्र सैर को चल पड़ते। कभी चीकू झाड़ियों में सोता रहता तो मीकू उसे आलसी, कामचोर न जाने क्या-क्या कहता? चीकू उसके बाद भी हँसते हुए उठता और अपने प्यारे दोस्त के साथ बातों में खो जाता। इसी प्रकार दोनों मित्रों के दिन सुख से बीत रहे थे।
एक दिन घूमते-घूमते दोनों की भेंट टीकू गीदड़ से हो गयी। टीकू अच्छी-भली मित्रता में आग लगने के लिए विख्यात था। ये बात चीकू मीकू भी भली-भाँति जानते थे, इसलिए दोनों बचकर निकल रहे थे। मीकू थोड़ा पीछे रह गया। बस! टीकू को मौका मिल गया-, "अरे मीकू! कहाँ उस चीकू के पीछे-पीछे घूमते हो? मेरे साथ चलो।" मीकू कछुए ने कहा-, "अरे! व मेरा मित्र है।" भाई टीकू कहाँ पीछा छोड़ने वाला था-, "मित्र! काहे का मित्र? वह तो तुम्हें सुस्त, कामचोर और पिछलग्गू कहता है क्योंकि तुम धीमे चलते हो।" इस बार मीकू को थोड़ा सा बुरा लगा, पर उसने बड़े धैर्य से जवाब दिया-, "अरे! वह मेरा मित्र है और मैं उसका पिछलग्गू नहीं हूँ।" टीकू ने कहा-, "हाँ, बिलकुल! अरे! तुम्हारे बाप दादा ने इन खरगोशों को हराकर जंगल में एक मिसाल कायम की थी।"
इधर चीकू को लगा कि मित्र तो काफी पीछे छूट गया। वह उछलते कूदते वापस आया तो उसने टीकू गीदड़ को जाते हुए देखा। आदतन उसने मीकू से कहा-, "सुस्त कहीं के.. कहाँ रह गए थे?" वैसे मीकू को बुरा न लगता, पर टीकू के भड़काने के कारण उसको बात बुरी लग गयी। उसने कहा-, "चीकू! हमारे ही बाप दादाओं ने तुम्हारे जैसे खरगोशों को हराया था। आज तुम मुझे सुस्त कह रहे हो?" चीकू हतप्रभ रह गया। इतनी सी बात मीकू को बुरी लग गयी। फिर भी वह समझाने के स्वर में बोला-, "अरे!आज तुम कैसी बात कर रहे हो? पहले क्या हुआ.. क्या नहीं, उसे मित्रता के मध्य क्यों ला रहे हो?" मीकू की बुद्धि पलट चुकी थी। उसने कहा-, "चीकू! दुबारा प्रतियोगिता होगी मेरे और तुम्हारे मध्य। मेरे जीतने के बाद ही तुम मुझे सुस्त कहना भूल जाओगे।" चीकू के समझाने का प्रभाव मीकू पर नहीं पड़ा। बात जंगल के राजा शेर के समक्ष पहुँची। चीकू आपनी बात रख ही रहा था कि टीकू गीदड़ बीच में बोल पड़ा-, "महाराज! प्रतियोगिता करने में हानि ही क्या है? जंगल वासियों का मनोरंजन ही होगा व मीकू का खोया आत्मसम्मान भी लौट आएगा।" चीकू के न चाहते हुए भी दौड़ आरम्भ हुई। चीकू भरे गले से दौड़ने लगा। मीकू आश्वस्त था कि चीकू अभी झाड़ियों के पीछे अपने पूर्वजों की भाँति सो जायेगा और वो स्वयं दौड़ जीत जायेगा। मीकू इस उहापोह में झाड़ियों झुरमुट भी झाँकता चल रहा था और धीरे धीरे पिछड़ता जा रहा था। चीकू दौड़ समाप्ति के स्थान पर पहुँच गया, जबकि मीकू अभी आधा रास्ता भी पार नहीं कर पाया था। जंगल के राजा शेर ने चीकू की विजय की घोषणा की। चीकू फिर भी उदास रहा! उसे अपनी मित्रता टूटने का बहुत दुख था। तालियों की गड़गड़ाहट के मध्य चीकू को विजय पदक दिया गया। मीकू दु:ख से भरा हुआ यह सोच रहा था कि अब चीकू उसका उपहास उड़ाएगा, पर यह क्या चीकू? उसे मंच पर बोला रहा था। मीकू के मंच पर पहुँचते ही चीकू ने उसे अपना मेडल पहना दिया। मीकू कुछ समझता इससे पहले चीकू ने कहा-, "इस हार-जीत का महत्व हमारी मित्रता के आगे कुछ नहीं है। हम दोनों ने अपने जीवन के सारे सुख-दु:ख साथ-साथ बाँटे है तो आज मैं अकेले विजेता कैसे? ईश्वर ने हर जीव को अलग अलग गुण दिया है और वह उन्हीं गुड़ के साथ अच्छा लगता है। मेरा मित्र धरती वा जल दोनों में रह सकता है, जबकि मैं केवल धरती पर। यदि यही प्रतियोगिता जल में हुई होती तो मैं एक कदम भी न चल पाता।" मीकू तब तक संभल चुका था। उसने चीकू से क्षमा प्रार्थना की और दोनों मित्र एक-दूसरे के गले लग गये। राजा शेर ने एक और पुरस्कार की घोषणा की जो दोनों मित्रों की न टूटने वाली मित्रता को जाता था।
संस्कार सन्देश
मित्रता की नींव विश्वास पर आधारित होती है।
लेखिका
सीमा द्विवेदी (स०अ०)
कम्पोजिट स्कूल कमरौली
जगदीशपुर (अमेठी)
कहानी वाचक
नीलम भदौरिया
फतेहपुर
✏️संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात
Comments
Post a Comment