44/2024, बाल कहानी- 13 मार्च



बाल कहानी- आलसी मोहित
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मोहित कक्षा 5 में पढता था। वह बहुत आलसी था। अपना गृह कार्य समय पर पूरा नहीं करता था। आज वह पेट दर्द का बहाना बनाकर स्कूल नहीं गया और गेंद लेकर बगीचे मे चला गया। बगीचे मे उसे कोई भी न दिखा। सभी लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। तब उसकी नजर एक कौवे पर पडी। कौवे के पास जाकर बोला-, "कौवे भाई.. कौवे भाई! मेरे साथ खेलो।" कौवे ने कहा-, "मुझे जन-जागरण के लिए जाना है। तुम किसी और के साथ खेलो। फिर उसे पेड की टहनी पर बैठा कबूतर दिखा। वह कबूतर से बोला-, "कबूतर भाई! आओ मेरे साथ खेलो।" कबूतर बोला-, "नहीं, भाई!  सुबह का समय है, मुझे अपने बच्चों को भोजन लेने जाना है। अगर मैं तुम्हारे साथ खेलूँगा तो मेरे बच्चे भूखे रह जायेगें। तुम किसी और से खेलो ।"
आलसी बालक निराश हो गया। फिर उसने फूलों पर बैठै भौंरे को देखा- उसने भौंरे को खेलने को कहा! भौरें ने कहा-, "मुझे पराग इकठ्ठा करना है। मेरे पास खेलने का समय नहीं है।" फिर वह चींटी के पास गया। चींटी ने भी खेलने से मना कर दिया, तब आलसी बालक सोचने लगा कि-, "इस संसार में जीव-जन्तु, कीट-पतंग  सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हैं। कोई भी आलसी नहीं है।  एक मैं ही आलसी हूँ, जो अपना काम समय पर नहीं करता हूँ।" उस दिन से वह समझ गया कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।

संस्कार सन्देश
हमें कभी भी आलस नहीं करना चाहिए, बल्कि मेहनत करनी चाहिए।

लेखिका-
दमयन्ती राणा
कर्ण प्रयाग, चमोली (उत्तराखण्ड)
कहानी वाचक
नीलम भदौरिया
फतेहपुर 

✏️ संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात

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