55/2024, बाल कहानी- 28 मार्च
बाल कहानी- रुचि
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शोभित कक्षा पाँच में पढ़ता था। वह पढ़ने में बहुत ही होशियार था, किन्तु उसे कविता और कहानियों में रुचि नहीं थी। उसकी रुचि विज्ञान और गणित में थी। वाकी अन्य विषयों का भी उसे अच्छा ज्ञान था। प्रार्थना स्थल पर जब उससे कहानी या कविता वाचन के लिए कहा जाता तो वह मौन हो जाता। सभी अध्यापक और बच्चे उसकी हँसी उड़ाते। अपनी हँसी होते हुए देखकर उसे बहुत बुरा लगता और मन ही मन खीज भी होती, किन्तु वह किसी से कुछ नहीं कहता।
दिन बीतते गये। कुछ दिनों बाद यह बात जब उसके माता-पिता को पता चली तो उन्होंने शाम को शोभित से इस बारे में पूछा! शोभित ने कहा कि-, "मैं क्या करूँ पापा? मुझे कविता-कहानी पढ़ने में कोई रुचि नहीं होती है।" शोभित के पापा ने कहा कि-, "क्या इस तरह रोज अपनी हँसी उड़ाते हुए बच्चों को देखकर तुम्हें अच्छा लगता है?"
"नहीं पापा!" शोभित ने कहा।
उसके पापा ने कहा कि-, "भले ही तुम्हें कविता-कहानियों में रुचि न हो, लेकिन स्कूल में जो गतिविधियाँ होती हैं, उनमें भी तुम्हारा दायित्व बनता है कि तुम भाग लो और सदा आगे रहो।"
पापा की बात सुनकर शोभित बोला-, "लेकिन मुझे तो कविता और कहानियाँ आती ही नहीं हैं, मैं उन्हें कैसे सुनाऊँगा?" शोभित की जिज्ञासा देखकर उसके पापा ने कहा कि-, "तुम उसकी चिन्ता मत करो! मैं तुम्हें रोज शाम को एक कविता और कहानी सुनाऊँगा और उसकी गतिविधि भी सिखाऊँगा। दूसरे दिन तुम स्कूल में प्रार्थना स्थल पर उसे सुनाना। इससे तुम्हें धीरे-धीरे इनमें रुचि भी बढ़ेगी और अध्यापकों और बच्चों के सामने हँसी का पात्र नहीं बनना पड़ेगा।" पापा की बात रोहित को अच्छी लगी।
शोभित अब रोज शाम को अपने पापा से कहानी और कविता सुनता, याद करता और फिर दूसरे दिन स्कूल में उन्हें सुनाता। शोभित के मुँह से इतनी सुन्दर, प्रेरणादायक, उपयोगी कहानियाँ और कविताएँ सुनकर सभी अध्यापक और बच्चे दंग रह गये। उन्होंने जब शोभित से उसके व्यवहार में अचानक आये इस परिवर्तन के बारे में पूछा तो उसने बताया कि-, "मेरे पापा शाम को मुझे रोज एक कहानी और कविता सुनाते हैं और उसकी गतिविधि भी रोज कराते हैं। वही मैं रोज यहाँ सुनाता हूँ।" सभी ने शोभित के पापा की और शोभित की सराहना की। धीरे-धीरे शोभित को कविता और कहानियों में इतनी रुचि बढ़ने लगी कि आगे चलकर वह स्वयं कविता और कहानियाँ लिखने लगा। अब उसकी कविताएँ और कहानियाँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और समाचार-पत्रों में छपने लगी। बड़े होने पर वह देश में आयोजित विभिन्न कवि सम्मेलनों और विचार-गोष्ठियों में भाग लेने लगा, लेकिन उसने विज्ञान और गणित के प्रति अपनी रुचि कमजोर नहीं होने दी। उसने आगे बढ़ने के लिए अपना प्रयास सतत् जारी रखा।
संस्कार सन्देश
कविता और कहानियाँ हमारे जीवन के अंग हैं। ये हमें सदैव अच्छा कार्य करने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
लेखक-
जुगल किशोर त्रिपाठी
प्रा० वि० बम्हौरी (कम्पोजिट)
मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)
कहानी वाचक
नीलम भदौरिया
जनपद-फतेहपुर
✏️ संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात
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