बेटी

पहली हलचल थी जब
मैं अस्तित्व में आयी थी,
अपनी माँ के गर्भ में मैंने
पहले पंख फैलाये थे।।

क्या बतलाऊँ क्या मंजर था
मेरे छोटे घर में,
दादा खुश थे, दादी खुश थी
और पापा भी मुस्काये थे।।

"पर ना जाने क्यों मैंने
माँ को सहमा हुआ देखा था"

आखिर ऐसा क्या डर था
जो माँ को सहमा जाता था,
समझ नहीं पा रही थी मैं
ये सब क्या होता था।।

तभी अचानक एक दिन मैंने
सुना दादी को पापा से कहते,
ले जाओ इसे जाँच कराने
क्या है कोख में पता कराने।।

इस बार इससे अपना वंश चलाने
वाला ही चाहिए,
मुझे इस बार एक प्यारा सा
पोता ही चाहिए।।

पहले ही बर्बाद कर दिया इसने हमको
दो-दो बेटी देकर,
अगर नहीं हुआ बेटा तो मिटना होगा
कोख को इसकी जान देकर।।

चिल्लाई माँ, रोयी माँ
नहीं करुँगी अब मैं ऐसा,
कितने पाप करूँ
अपनी कोख को आप मिटाकर।।

"आखिर क्या दोष है मेरा
और उस मासूम का"

अब आया समझ में मेरी
माँ क्यों सहमी-सहमी थी,
क्यों रोती थी छुप-छुपकर वो
क्यों डर-डरकर रहती थी ।।

पर हुआ वही जो दादा,
दादी और पापा ने चाहा था ,
बहुत रोयी माँ ,और बहुत चिल्लायी
मगर किसी को नहीं पड़ी
उसकी करुण पुकार सुनायी।।

और अंत में माँ ने भी
अधिक रक्तस्राव के कारण
अपने प्राण गँवाये,
एक बेटे के खातिर
फिर से बलि हो गयी
दो बालाएँ।।

रचयिता
सुमन दुम्का,
रा0प्रा0वि0 गिद्धपुरी,
विकास खण्ड-रुद्रपुर,
जनपद-उधम सिंह नगर,
उत्तराखण्ड।

Comments

Total Pageviews