संवेदी अंग

संवेदी अंग कुल पाँच।
इन पर कभी न आये आँच।

चलो जान लें इनके काम।
जीवन करते ये आसान।।

जीभ हमारी बेहद कोमल।
स्वाद बताये चखकर फौरन।।

खट्टा, मीठा, नमक या तीखा।
बोली भी इससे ही सीखा।

बत्तीस पहरेदार हैं दाँत।
कभी न आये इस पर आँच।।

आँखों से है शोभा इस मुख की।
देखे सुंदरता इस जग की।।

रंग-बिरंगी दुनिया जगमग।
आसमान के तारे चमचम।।

पलक मूँदते ही अंधियारा।
खुले तो सुंदर दिखे नज़ारा।।

कान के काम तो बड़े महान।
सबकी बोली ले पहचान।।

सुनकर फौरन कर ले भेद।
भारी शोर से इनको खेद।।

नाक हमारी शान बढाती।
सूंघकर खुशबू हमें बताती।

गन्ध हो अच्छी तो इतराती।
दुर्गंध न इसे सुहाती।।

छूकर जब करते पहचान।
त्वचा का होता  योगदान।।

ठंडा-गरम आकार बताये।
चिकना-खुरदरा सब राज सुझाये।।

आजीवन करते सहयोग।
करो सफाई हर अंग की रोज।।

स्वच्छ रहें, स्वस्थ रहें
जीवन भर मस्त रहें।

रचयिता
पुष्पा पटेल,
प्रधानध्यापक, 
प्राथमिक विद्यालय संग्रामपुर,
विकास क्षेत्र-चित्रकूट,
जनपद-चित्रकूट।

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