03/2024- बाल कहानी 18 जनवरी 2024
बड़ों की बातें
किसी गाँव में रामू अपने माता-पिता के साथ रहता था। गाँव के पास ही घना जंगल था। श्यामू को रोज स्कूल जाते समय कुछ दूर पर वह जंगल दिखायी देता था। वह अपने दोस्तों और शिक्षकों से उस जंगल में जाने की इच्छा व्यक्त करता था। सभी उसे उस जंगल में जाने से रोकते थे। उस जंगल में जंगली और भयानक जानवरों के बारे में सुनकर वह भयभीत तो होता था, लेकिन जंगल देखने की इच्छा को मन से दूर नहीं कर पाया। वह सोचता था कि- आखिर उस जंगल में ऐसा क्या है, जो सभी लोग मुझे वहाँ जाने से रोकते हैं।
एक दिन उसने अपनी माँ से कहा कि- , "माँ! एक बात बताओ!"
माँ ने कहा-, "हूँ..बता रामू क्या बात है?" रामू झट बोल पड़ा -, "माँ! मैं स्कूल जाता हूँ, तो मुझे वह जंगल रोज कुछ दूरी पर दिखायी देता है। उस जंगल में क्या है?" माँ ने कहा कि-, "बेटा! जंगल ही है। जंगल में पेड़-पौधों के अलावा और क्या होता है? अरे! तू रोज स्कूल जाते समय देखता है और फिर भी पूछता है कि जंगल में क्या है?"
"ठीक है माँ!" रामू यह कहकर जल्दी से बस्ता लेकर स्कूल चला गया।
शाम को जब सभी बच्चे स्कूल से वापस आ गये और रामू देर तक घर नहीं आया तो रामू के माँ-बापू को बहुत चिन्ता हुई। तभी रामू की माँ को सुबह रामू और उसकी कही बातें याद आयीं। उसने अपने पति को सारी बातें बतायीं और दोनों कुछ ग्रामीणों को लेकर जंगल की ओर गये।
जंगल में बहुत खोजने पर अन्त में एक जगह सियार को ऊपर एक चट्टान की ओर टकटकी लगाये हुए देखा। उन्हें कुछ सन्देह हुआ और वे तुरन्त सभी को बुलाकर एक साथ उस ओर गये। गाँव वालों का हल्ला सुनते ही सियार वहाँ से भाग गया। सभी ने जैसे ही ऊपर देखा तो चट्टान पर रामू भयभीत सा सिकुड़ा बैठा हुआ था। रामू ने सभी को देखा तो तुरन्त आवाज लगायी-, "मैं रामू हूँ। इस सियार के डर से यहाँ छिपा था। यह सियार यहाँ नहीं चढ़ सकता था, इसलिए मैं यहाँ ऊपर आ गया। मुझे यहाँ से नीचे उतारो।"
रामू के इतना कहते ही उसके माता-पिता 'रामू..रामू मेरा बेटा' कहते हुए उसे वहाँ से नीचे ले आये और उसके ऊपर हाथ फेरने लगे कि कहीं उसे चोट तो नहीं लगी है! फिर दोनों ने उसे गले लगाया और उठाकर सभी लोगों के बीच में ले आये। गाँव के मुखिया ने कहा कि-, मुझे पता है रामू कि तुम बहुत दिनों से जंगल में आने के लिए तरस रहे थे। तुम्हें तुम्हारे दोस्तों और शिक्षकों ने मना भी किया था, फिर भी तुम नहीं माने और अपनी जान खतरे में डाल दी।"
रामू बोला-, "सब लोग मुझे माफ कर दें! मैं आज के बाद अभी इधर आने की सोचूँगा भी नहीं।" मुखिया-, "अब तो तुम तो ठीक है, कोई भी यहाँ आने की नहीं सोचेगा।" मुखिया के साथ सभी ग्रामीण भी हँसने लगे और वे अपने गाँव में आ गये।
संस्कार सन्देश-
हमें बड़ों की बातों को हमेशा स्मरण रखना चाहिए। इनकी बातों में हमारा कल्याण निहित होता है।
✍️🧑🏫लेखक-
जुगल किशोर त्रिपाठी
प्रा० वि० बम्हौरी (कम्पोजिट)
मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)
✏️ संकलन
📝 टीम मिशन शिक्षण संवाद (नैतिक प्रभात)
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