02/2024- बाल कहानी 17 जनवरी 2024

शैक्षणिक भ्रमण 
आज विद्यालय के बच्चों में सुबह से ही बहुत उत्साह था। कल उनके गुरूजी ने कहा था कि-, "आज के दिन सभी बच्चों में से पाँच बच्चों को शैक्षिक भ्रमण के लिए कुछ दर्शनीय स्थानों पर ले जाया जायेगा।" 
सभी बच्चे चाहते थे कि उन्हें भी ये अवसर दिया जाये, लेकिन गुरूजी ने शर्त रखी थी, कि जो बच्चे उनकी कुछ शर्तों को पूरा करते हैं, वे ही जा सकेंगे। वे शर्तें थीं कि...
पहली- बच्चे को व्यवहार अनुशासित हो।
दूसरी- बच्चे की विद्यालय की वेशभूषा अच्छी स्थिति में हो। 
तीसरी- बच्चे का सभी विषयों का कार्य पूरा हो।
चौथी- बच्चे की उपस्थिति इस माह अस्सी प्रतिशत रही हो।
पाँचवीं- बच्चे को अर्धवार्षिक परीक्षा में भी अच्छे अंक मिले हों।
जो भी इन शर्तों को पूरा करता हो, वही टूर पर जा सकेगा। 
फिर क्या था! सभी में और अधिक उत्साह बढ़ चला। पर कुछ को निराशा ही हाथ लगी। शरारतें करना, कक्षा में शोर मचाना, विद्यालय गन्दी वेशभूषा में आना, प्रतिदिन न आना, अपना काम पूरा न करना, परीक्षा को गम्भीरता से न लेना आदि ये बातें इतना नुकसान करवा देती होंगी, कभी सोचा भी नहीं था। 
प्रत्येक कक्षा से दो-दो बच्चों का चयन हुआ। कक्षा आठ के अर्पित को भी चुना गया। घर आकर जब उसने ये बात सबको बतायी तो उसके पिताजी ने कहा-, "कहीं जाने की जरूरत नहीं है। पढ़ाई करो, घूमना-फिरना तो सारी उम्र होता रहेगा।"
बेचारे अर्पित का विद्यालय में आखिरी साल था। इसके बाद तो वह दूसरे विद्यालय में चला जायेगा। वहाँ ये अवसर मिलेगा भी या नहीं! लेकिन पिताजी की बात भी माननी ही थी। 
अर्पित ने अगले दिन विद्यालय आकर भ्रमण पर जाने से मना कर दिया। अब तो उसकी जगह कुशल को जाने का अवसर मिला। 
अगले दिन पूरी तैयारी से सभी बच्चे गुरूजी के साथ बस से शैक्षणिक भ्रमण पर चले गये। कई ऐतिहासिक और धार्मिक स्थानों की रोमांचक यात्रा सभी के लिए शानदार और अविस्मरणीय अनुभव थी। बच्चे अपने शिक्षकों के साथ खेल-खेल में जाने कितनी जानकारी ले रहे थे और दूसरे विद्यालय के बहुत सारे बच्चों के साथ भी मिलकर खूब खुश थे। 
अगले दिन विद्यालय में शिक्षक-अभिभावक बैठक थी। इस बैठक में उपस्थित अभिभावकों के समक्ष सभी बच्चों को अपनी यात्रा के अनुभव बताते हुए सुना। अर्पित के पिताजी को बहुत पछतावा हो रहा था। उन्होंने अपने बेटे के उतरे हुए चेहरे को देखा। मन ही मन तय किया कि आगे से वे उसे ऐसे किसी भी अवसर को खोने नहीं देंगे, जो उनके बेटे की शिक्षा से सम्बन्धित हो।‌ वे ये बात अच्छी तरह समझ चुके थे कि पुस्तकीय ज्ञान के साथ ही व्यावहारिक ज्ञान के लिए बाहर की दुनिया से बच्चों का परिचय बहुत आवश्यक है।

संस्कार सन्देश-
समाज के बारे में बहुत सारी बातें जानने के लिए, कुछ नया सीखने के लिए शैक्षणिक भ्रमण बच्चों के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। 

✍️👩‍🏫लेखिका-
शिखा वर्मा (स०अ०)
उ० प्रा०वि० स्योढ़ा
बिसवाँ, सीतापुर

✏️ संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद (नैतिक प्रभात)

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