60/2026, बाल कहानी- 08 अप्रैल
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 60/2026
*08 अप्रैल 2026 (बुधवार)*
बाल_कहानी - #दर्द_के_आगे_जीत_है
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मुनिया और राजू में आज घमासान छिड़ा हुआ था। राजू का मानना था कि, "लड़कों में माँसपेशियों की ताकत अधिक होती है। वे शारीरिक शक्ति में लड़कियों को हरा सकते हैं।" मुनिया भला क्यों मानती? उसने कहा, "अरे ! जाओ भी... लड़कियों की इच्छा शक्ति बड़े-बड़े काम कर डालती है, जो लड़कों के बस का नहीं।" बस फिर क्या था! राजू ने मुनिया की अचानक से चोटी खींची तो मुनिया भी मुक्का तानकर उसके पीछे दौड़ी। राजू दादी...दादी कहता दादी के पीछे छुप गया। मुनिया दौड़ती हुई आयी और गुस्से में बोली, "दादी! राजू को मेरे हवाले कर दीजिए। आज मैं इसे बिना मारे खाना नहीं खाऊँगी।" दादी बीच बचाव करने लगी। उधर राजू दादी की आड़ में मुनिया को चिढ़ाने लगा। हारकर दादी ने ब्रह्मास्त्र चलाया, "अच्छा.. बस! तुम दोनों को कहानी नहीं सुननी है क्या? इस ब्रह्मास्त्र का जादू कभी खत्म नहीं होता है। राजू और मुनिया एक-दूसरे को चिढ़ाते दादी से जा लिपटे। दादी के प्यार भरे स्पर्श ने बाल-जिज्ञासा को जगा दिया और शुरू हो गई एक सच्ची और मर्म स्पर्शी कहानी। बच्चों! आज मैं तुम्हें एक हिम्मती लड़की की कहानी सुनाती हूँ-
लड़की की उम्र होगी यही कोई 23-24 साल। सपनों की उम्र हौसलों की उड़ान लिए बालिका ने खेल-कूद की दुनिया में कदम रखा और देखते-देखते अपने मजबूत इरादों से वह वॉलीबॉल की ऊँचाइयाँ छूने लगी। उसे राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी होने के कारण रेलवे में नौकरी का ऑफर मिला। इसी सन्दर्भ में वह लखनऊ से दिल्ली की यात्रा के लिए ट्रेन पर सवार हुई। रात का सफर था, पर उसने डरना तो जाना ही न था। रात में जब वह वॉशरूम से निकल रही थी तो अचानक उसे अपने कोच में चीख-पुकार की आवाज सुनाई पड़ने लगी। बिना घबराए जब तक वह स्थिति समझती, तब तक लूट-पाट के उद्देश्य से घुसे बदमाश उसका बैग लेकर भागने लगे। तभी एक ने उसके गले से सोने की चेन खींचने का प्रयास किया। निडर बालिका ने उनका डटकर मुकाबला किया। इसने चेन व बैग न ले जाने दिया।
"अरे बाप रे!" राजू डर के मारे दादी से लिपट गया।
"अरे! राजू! डर मत। आगे तो सुन..।" मुनिया प्यार से बोली। कहानी सुनने में खोये राजू और मुनिया को यह भी याद नहीं था कि अभी थोड़ी देर पहले उनकी लड़ाई हो रही थी। दादी ने गहरी साँस लेकर कहा, "इस पर बदमाश और आक्रामक हो गए। उन्होंने बालिका को उठाकर चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया।" राजू मुनिया की धड़कन बढ़ गई।
"फिर दोनों ने प्रश्नवाचक दृष्टि से दादी को देखा? फिर क्या बेचारी लड़की पटरी पर जा गिरी? इस समय दूसरी ट्रेन भी पटरियों पर दौड़ रही थी, जिसका एक पहिया लड़की के एक पैर को कुचलता चला गया। उस नीरव रात में बस वह लड़की थी और उसकी दर्द भरी चीखें..। सुबह जब लोगों ने उसे पहचाना तो उसे अस्पताल ले गये। वहाँ पर उसका कुचला पैर डॉक्टर को काट देना पड़ा और दुनिया में यह अफवाह फैल गई कि वह आत्महत्या करना चाहती थी। "अरे !.." मुनिया क्रोध से बोली, "कैसे लोग हैं दादी?"
"हाँ, मुनिया! पर उसने हार न मानी और वहीं अस्पताल के बिस्तर पर लेटे-लेटे उसने एक सपना बुन डाला.. माउन्ट एवरेस्ट की विजय का। डॉक्टर, दुनिया, समाज, परिवार सबकी यही सलाह थी कि, "तुम कृत्रिम पैर से ऐसा नहीं कर पाओगी?" पर उसने ठान लिया तो ठान लिया। अस्पताल से निकलकर उसने पर्वतारोहण की ट्रेनिंग ली। हिमालय की हाड़ कँपाती हवाएँ, कृत्रिम पैर भी उसके हौसले के आगे परास्त हो गये। 21 मई 2013 में माउन्ट एवरेस्ट पर भारत का तिरंगा शान से लहरा उठा। जानते हो, राजू और मुनिया! वह लड़की कौन थी? वह थी.. अरुणिमा सिन्हा... माउन्ट एवरेस्ट विजित करने वाली प्रथम दिव्याँग महिला।"
"वाह दादी! वाह! मजा आ गया। अरुणिमा की हिम्मत को सलाम!"
#संस्कार_सन्देश -
कोई भी दर्द इतना बड़ा नहीं होता, जितनी कि इन्सान की हिम्मत।
कहानीकार-
डॉ #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कम्पोजिट विद्यालय कमरौली जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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