57/2026, बाल कहानी- 04 अप्रैल

#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 57/2026
*04 अप्रैल 2026 (शनिवार)*
#बाल_कहानी- #रत्नगर्भा
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रवि का दोस्त आजकल गाँव आ रखा था। उसका नाम सूरज था। उसे भी गाँव में रहना अच्छा लगता था। एक दिन रवि की माँ ने कहा, "दोनों बगीचे से सब्जी निकालकर लाओ।" सूरज ने कहा, "कौन सी सब्जी लानी है?" माँ ने कहा-"जो तुम्हें पसन्द हो।" दोनों दोस्त बगीचे में चले गये। रवि ने कहा, "मुझे तो हरी सब्जी अच्छी लगती है।" सूरज ने कहा कि, "मुझे आलू की सब्जी अच्छी लगती है।" दोनों बगीचे से राई निकालने लगे। तभी सूरज ने कहा, "रवि आलू तो मुझे दिखाई नहीं दे रहे हैं।" रवि हँसने लगा और कहा कि, "दिखाई कहाँ से देंगे वे तो मिट्टी के अन्दर रहते हैं।" तभी रवि कुदाल लेकर आता है और जमीन से आलू निकाल देता है। सूरज ने कहा, "दोस्त! मुझे तो पता ही नहीं था कि आलू जमीन के अन्दर होते हैं। मैने तो केवल आलू खाये हैं लेकिन पता नहीं था।" रवि ने अपने दोस्त को जमीन के अन्दर और बाहर उगने वाली सभी वस्तुओं के बारे में बताया। सूरज ने रवि का 'धन्यवाद' किया। सूरज तब अपने घर गया और अपने माता-पिता को खेती करने के लिए कहने लगा। 
एक दिन खेत में काम करते हुए उसने माँ से पूछा, "मांँ! धरती में ये सब कहांँ से उगता है? हम तो केवल कुछ बीज डाल देते हैं और कभी कभार पानी। फिर ये अन्न, फल और सब्जियाँ कौन और कैसे उगाता है?" 
मांँ ने सूरज के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए धरती की तरफ देखते हुए कहा, "बेटा! ये जो धरती है ना, यह बहुत दयालु है। हम सब इसके बच्चे हैं, जैसे मैं तुम्हारी देखभाल करती हूंँ ना, वैसे ही ये धरती मांँ भी हम सब का पालन-पोषण करती है। ये तो बस देना जानती है। ये रत्नगर्भा है। इसके गर्भ में अनेकानेक बहुमूल्य रत्न गढ़े हैं। और ये सब कुछ हमें ही देती है।"
"पर मांँ बदले में हम इस धरती मांँ को कुछ देते हैं कि नहीं"? सूरज ने जिज्ञासावश पूछा। मांँ ने कहा, "देते हैं ना.. कूड़ा करकट, कारखानों का दूषित धुआंँ, जंगलों का कटान, नदियों पर रोक। ये सब हम बदले में धरती मांँ को वापस करते हैं। है न मजे की बात।" सूरज सोचने लगा, "पर ये सब तो बुरी चीजें हैं। इनसे धरती मांँ को क्या लाभ होगा? मांँ से पूछा! और उदास होकर एक जगह बैठ गई और बोली, "ये सब चीजें धरती को देकर हम सब अपने भविष्य को अन्धकार की तरफ ले जा रहे हैं। आने वाला समय बहुत डरावना होने वाला है बच्चे। जब एक दिन धरती मांँ का धैर्य जबाव देगा तो पृथ्वी का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और जीवन खतरे में पड़ जाएगा। अपनी सुविधाओं के लिए अन्धाधुन्ध दोहन खतरनाक है।" 
"पर इसे रोकने के लिए क्या किया जा सकता है मांँ?"
"संसाधनों का सीमित उपयोग, पुनः उपयोग और अन्य कई तरकीबें हैं जो धरती मांँ के अनावश्यक बोझ को हल्का कर सकती हैं।" सूरज बोला, "मांँ! कुछ कुछ मुझे समझ आ रहा है। मैं बड़ा होकर अपना जीवन ऐसा बनाऊंँगा कि इस धरती मांँ के लिए कुछ कर पाऊंँ ताकि अन्य लोग भी देखकर अपनी कार्य प्रणाली में परिवर्तन ला सकें और इस धरती मांँ को सुन्दर और स्वस्थ बनाने में अहम भूमिका निभाएंँ।" यह सुनकर मांँ ने सूरज का माथा चूम लिया।

#संस्कार_सन्देश -
धरती हमारी पालक-पोषक है। हमें माँ की इसकी विशेष देखभाल करना चाहिए। इसी में सबका कल्याण है।

कहानीकार - 
#संगीता_राणा (बाल वाटिका शिक्षिका)
रा० प्रा० वि० जैली, ब्लॉक- जखोली, रुद्रप्रयाग

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद 
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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