किसान दिवस

क्या किसानों की दशा

को भी सुधारा जा रहा?

जो हम पर कर्ज़ उनका

वो उतारा जा रहा?

जिस धरा को प्यार से 

कृषकों ने सजाया आज तक।

बाकी धरावासियों को 

क्या दर्द नजर आ रहा??

खोकर सारे स्वप्न अपने

अनाज जो उगा रहा।

क्या उसको अपने श्रम का

असली फल मिल पा रहा?

कभी मौसम की मार पड़ी

कभी बाज़ार भी भरमा रहा।

मेहनत का सही दाम भी

उसको कहां मिल पा रहा?

कर्ज़ तले दबा किसान

फिर भी मुस्कुरा रहा।

देश का पेट भरने को

खुद भूखा भी रह जा रहा।

क्या नीतियों की रोशनी

उस आँगन तक भी आ रही?

हल की लकीरों में छुपी

तक़दीर बदल पा रही?

डिजिटल इंडिया के दौर में

कुछ अंश भी वह पा रहा?

किसान सशक्त, कर्ज़ मुक्त हो

क्या वह सवेरा आ रहा?


रचयिता

डॉ0 निशा मौर्या, 

सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय मीरजहांपुर,
विकास खण्ड-कौड़िहार-1,
जनपद-प्रयागराज।

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