217/2025, बाल कहानी- 17 दिसम्बर

#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 217/2025
*17 दिसम्बर 2025 (बुधवार)*
#बाल_कहानी - #पीठ_पीछे_का_सत्य
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हमेशा की तरह राजू और मुनिया स्कूल से घर की ओर लौट रहे थे। मुनिया आज बहुत उदास थी। राजू अपनी मस्ती में भरा उछलता-कूदता आगे चल रहा था। अचानक जब वह पलटा तो उसे अपनी बहन कुछ अधिक ही उदास व चुप दिखाई दी।
 "क्या हुआ मुनिया? किसी ने कुछ कहा क्या? तेरी सबसे अच्छी सहेली शिला से लड़ाई तो नहीं हो गई?" मुनिया की रुलाई फूट पड़ी, पर वह नादान राजू से क्या कहती? आँसुओं को छुपाते बस रुँधे गले से इतना बोल पायी कि, "मेरे सिर में दर्द हो रहा है राजू।" 
"अच्छा!" राजू ने कहा और आगे बढ़ गया। थोड़ी देर में दोनों घर पहुँच गये। दादी मुनिया का मुरझाया चेहरा देखकर तुरन्त समझ गई कि कुछ तो हुआ है, पर उन्होंने व्यक्त नहीं किया। भोजन करते समय भी मुनिया की बेचैनी साफ दिख रही थी। गृहकार्य करते समय भी कुछ ढूँढती सी आँखें। "चल राजू! तू थोड़ी देर आराम कर ले और मुनिया! तू मेरे पास लेट जा!" दादी का प्यार-भरा स्पर्श पाकर मुनिया फफककर रो पड़ी। फिर धीरे-धीरे सुबकती हुई बोली, "नानी! मुझे नहीं मालूम था कि शीला मेरे बारे में पीछे से इतने गलत विचार रखती है! नानी सब ऐसे ही होते हैं क्या? सामने कुछ और पीछे से कुछ?" नानी उसे सांत्वना देती रही। रात में भोजन के पश्चात राजू कहानी सुनने दादी के पास आया तो मुनिया वहाँ पहले से ही उपस्थित थी। "दादी..दादी! आज कौन-सी कहानी सुनाने वाली हो?"
"पीठ पीछे का सच!"
"मतलब...?" राजू आश्चर्यचकित होकर बोला। "यह तुम कहानी से ही जानोगे।" दादी चश्मा सँभालते हुए बोली। 
नगर के एक ख्याति लब्ध विद्यालय में बहुत सारे बच्चों की तरह सलोनी और साक्षी दो सहेलियाँ एक ही कक्षा में पढ़ती थीं। दोनों पढ़ने में बहुत अच्छी थीं। सलोनी की इंग्लिश बहुत अच्छी थी और साक्षी की गणित। दोनों सखियों में एक अनूठी स्पर्धा रहती थी। सलोनी और साक्षी अपनी हर बात एक-दूसरे से शेयर करती थी। उनकी एक ही सहेली थी उत्तरा। पर धीरे-धीरे समझदार उत्तरा को समझ आने लगा कि सलोनी बहुत भोली है और साक्षी बेहद चालाक। सलोनी अगर कोई भी नया सामान खरीदती तो साक्षी को अवश्य दिखाती। साक्षी भी उस वस्तु की भरपूर प्रशंसा करती। पर पीछे से वह सलोनी की खिल्ली उड़ाती, "इसे तो सामान खरीदना ही नहीं आता व्यर्थ की वस्तुओं पर यह धन का दुरुपयोग करती है।" कभी सलोनी नया हेयर स्टाइल करती तो फिर उसे सामने प्रशंसा और पीछे से खिल्ली मिलती। सलोनी को किताबें संग्रह करने का भी शौक था। वह स्वयं तो पढ़ती ही, साथ ही साक्षी को भी पढ़ने के लिए देती। पर साक्षी पीछे से कहती, "अरे! ऐसी किताबें कौन पढ़ता है? दिमाग चाट गई मेरा!" सलोनी इन सब बातों से बेखबर अपनी दुनिया में मस्त रहती, जिसमें वह थी और उसकी सबसे प्यारी सहेली साक्षी। ऐसे ही एक दिन साक्षी उसका मजाक बना रही थी। उत्तरा से रहा न गया। उसने सलोनी की आँखें खोलने का दृढ़ निश्चय किया। जब सलोनी को उसकी असलियत मालूम पड़ी तो उसका ह्रदय ही टूट गया। उसे समझ ही नहीं आया कि सामने खड़ी लड़की जो उसका मजाक बना रही है, वह साक्षी है उसकी अभिन्न मित्र। मुनिया ने नानी की तरफ प्रश्न वाचक दृष्टि से देखा कि यह कहानी तो उसकी और शिला की है, पर इसका अन्त क्या? दादी ने कहानी आगे बढ़ाई- उत्तरा ने भावनात्मक रूप से टूटी बिखरी-सलोनी को प्यार से समझाते हुए कहा कि, "अगर उसी की तरह साक्षी को भी उससे लगाव है तो उसे अपने व्यवहार पर पछतावा होगा। लेकिन अगर उसे तुम्हारी मित्रता की कद्र नहीं है तो तुम उससे सावधान और सतर्क रहो! जीवन में आगे बढ़ने के लिए सही-गलत की पहचान बहुत आवश्यक है। रोना तो साक्षी को चाहिए कि उसने अपना एक अमूल्य मित्र खो दिया और तुम्हें प्रसन्न होना चाहिए कि सच से तुम्हारी मुलाकात अति शीघ्र हो गई।" सलोनी ने दृढ़ता से अपने आँसू पोंछे। आज उत्तरा के रूप में उसे एक सच्ची सहेली मिल चुकी थी। 

संस्कार सन्देश -
जीवन में हमें हृदय के साथ-साथ मस्तिष्क का भी प्रयोग आना चाहिए, ताकि हम सही-गलत की पहचान कर सकें।

कहानीकार-
डॉ #सीमा_द्विवेदी (स०अ०)
कंपोजिट विद्यालय कमरौली जगदीशपुर, अमेठी (उ०प्र०)

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

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