225/2025, बाल कहानी- 29 दिसम्बर
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 225/2025
*29 दिसम्बर 2025 (सोमवार)*
#बाल_कहानी- #बिलौखी
-------------------
सर्दियों की गुनगुनी धूप किसी च्यवनप्राश से कम नहीं होती। आज पिछले दो तीन दिन के मुकाबले सर्दी कम थी। सूर्य नारायण अपने निर्धारित समय से लेट, किन्तु लग रहा था कि वे अपने स्थान पर समय से आ गये हैं। मन प्रफुल्लित था। स्नानादि करके हम भी उस ईष्ट का सानिध्य पाने की लालसा से छत पर चढ़ गये।
पता नहीं कब एक बिल्ली का छोटा, प्यारा बच्चा हमें अपने बच्चों-सा प्यारा हो गया। हो भी क्यों नहीं, छोटा बच्चा किसी का भी हो, होता ही बहुत प्यारा है। उसको बच्चों ने एक प्यारा-सा नाम भी दे दिया- 'बिलौखी'। शरारतें ऐसी, जो कभी प्यार की इच्छा बढ़ाती तो कभी क्रोध को परवान चढ़ा देती।
पूरे घर में बिलौखी का ताँडव ओढने बिछाने के कपड़े और पहनने के सब एक-दूसरे में रट्ट- सट्ट। किसी बिस्तर पर किसी के भी पास सोना। डाँटने पर मासूमियत बिखेर देना।
यही घर की बिगड़ैल बिलौखी, जिसकी माँ आये दिन उसकी खातिर नया-नया शिकार जिन्दा या मुर्दा घर में ले आती। कभी कबूतर, तो कभी चूहे को उसके घर से खींच लाती। सच कहूँ! बिलौखी शरारती होने के बाद भी जितनी प्यारी लगती, उसकी माँ को देखते ही लठ्ठ मारने को मन करता। शिकारी कहीं की! पर क्या करें? सन्तान के प्रति उसकी माँ का प्यार समझकर कुछ हद तक हम बर्दाश्त भी कर लेते।
गुनगुनी धूप भला किसे नहीं सुहाती! हम छत पर चढ़े, बिलौखी हमसे पहले छत पर पहुँच गयी। मैं चटाई बिछाकर सूर्य की ओर ऐसे बैठा जैसे सारी विटामिन डी आज ही लेनी हो, जबकि मेरे विपरीत बिलौखी मुझसे एकदम सटकर ऐसे बैठी जैसे बेचारी कोई बड़ी पहुँची हुई साध्वी हो। कुछ देर बाद बिलौखी की माँ बिल्ली गोल-गोल आँखें मटकाते हुए मुझे झीने से आती दिखाई दी। मैं कुछ माजरा समझ पाता, उससे पहले ही बिलौखी तीव्र गति से अपनी माँ के सामने जा पहुँची। वे दोनों माँ बेटी मुझसे लगभग चार-पाँच फिट की दूरी पर थी। अचानक सारा माजरा मेरी समझ में आ गया। बिलौखी की माँ उसके लिए आज एक गिलहरी अपने मुँह में दबाकर लायी थी। बिलौखी अपनी माँ को ऐसे घूरकर देख रही थी मानो एक क्षण और देरी होने पर वह अपनी माँ को ही गिलहरी की जगह खा जायेगी। बिलौखी अपनी माँ के द्वारा लाये गये शिकार को देख रही थी और उसकी माँ हर माँ की तरह अपने बच्चों के प्रति कर्तव्य-बोध से। और मैं किंकर्तव्यविमूढ़ होकर उन दोनों माँ, बेटियों के अपार स्नेह के पलों का मौन साक्षी था। एक अजीब कशमकश के साथ में अवाक् होकर अपनी आँखों से सब देख रहा था।
एक ओर भूख, दूसरी ओर वात्सल्य और उनके बीच में एक जिन्दगी। बिलौखी बार-बार अपने छोटे-छोटे पन्जों से धरती को चीर रही थी शायद कह रही हो, "जल्दी दो, माँ! भूख लगी है।" उसकी माँ बार बार मुँह में गिलहरी को दबाए दाँए-बाँए देख रही थी, शायद वो सन्तुष्ट होना चाहती थी कि कोई तीसरा तो नहीं, जो मेरे शिकार पर नजरें गड़ाए हो और उसके मुँह में दबी गिलहरी की झब्बूदार पूँछ बार-बार हिल-हिलकर शायद भगवान से आजाद होने की गुहार लगा रही हो।
मुझे लगा बिल्ली के मुँह में शायद गिलहरी का राम नाम सत्य हो गया होगा। लगभग एक मिनट बाद बिल्ली ने पूरे आत्मविश्वास के साथ गिलहरी को बिलौखी के सामने परोस दिया। अब दबी कुचली मृतप्राय गिलहरी नीचे और बिलौखी पूरे आनन्द में कभी गिलहरी के पास मुँह ले जाकर उसे सूँघती और फिर अपनी जीभ अपने मुँह पर फिराती तो कभी अपने पंजों से गिलहरी की झब्बूदार पूँछ पर स्पर्श करती। माँ बेटी के हाव-भाव उनके चहरे की अथाह सन्तुष्टि को देखकर लग रहा था, जैसे उन्होंने विश्व-विजय प्राप्त कर ली हो। मूँछें अलग एक साथ रिपूदल पर तीर के समान सीधी तनी थी। अगले पल क्या होगा, पता नहीं? पर मेरी नजर एक पल को भी इस पल से हटने को राजी नहीं।
तभी अचानक बाजी पलट गयी? भगदड़ मच गयी। आगे बिल्ली, पीछे बिलौखी और पडौसी की छत पर रखी ईंटों के चिट्ठे पर गिलहरी लम्बी-लम्बी साँस खींच रही थी। एक क्षण रुककर बिल्ली ईंटों के चिट्ठे पर, बिलौखी चिट्ठे के नीचे और गिलहरी बिजली के पोल पर। बिलौखी, बिल्ली को घूर रही, बिल्ली, गिलहरी को और गिलहरी पोल पर गुनगुनी धूप में ईश्वर का धन्यवाद करती नजर आयी।
गिलहरी मौत के मुँह से निकल कर जीवित थी। इसलिए कहा जाता है- जाको राखै साईयाँ, मार सके ना कोय।।
#संस्कार_सन्देश -
हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ अर्थात बिना समय आये कोई किसी को क्षति नहीं पहुँचा सकता है।
कहानीकार-
कुशलपाल सिंह चौहान (शि०मि०)
प्रा० वि० जहराना
विकासखण्ड- चण्डौस
जनपद- अलीगढ़ (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
Comments
Post a Comment