57/2024, बाल कहानी- 01 अप्रैल

बाल कहानी- फिजूलखर्ची
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गाँव के विद्यालय की कक्षा आठ में पढ़ने वाला साहिल एक लापरवाह बच्चा था। साहिल की माँ राधा एक बहुत ही सरल स्वाभाव की और परिश्रमी महिला थी। साहिल के पिता की तबियत अक्सर खराब रहती थी, इसलिए वे काम अधिक नहीं कर पाते थे। घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी। पर साहिल को फिजूलखर्ची व दिखावा करने की आदत थी। उसे भी घर से कभी-कभी पाॅकेटमनी के लिए कुछ रुपये मिलते थे। वह उन रुपयों को तुरन्त खर्च कर देता। खाने-पीने की चीजें लेकर उसी दिन सारे रुपये उड़ा देता और फिर से अपनी माँ से रुपये माँगता। माँ बेचारी बहुत समझाती, लेकिन साहिल की समझ में नहीं आता। वह जिद करके किसी भी तरह माँ से रुपये ले लेता और फिर दोस्तों में रौब दिखाता कि उसे रोज उसके घर से बहुत सारे रुपये मिलते हैं। उसके पड़ोस में रहने वाले मुदित को यह सब पता था। 
राधा अपने परिवार की देखभाल करने के लिए हमेशा खूब मेहनत करती थी। वह अपने पति के साथ मेहनत करके रुपये कमाने की कोशिश करती थी। अपने घर का काम करने के साथ-साथ खेतों का काम भी करती थी।
एक दिन मुदित ने साहिल को आराम से अपने पास बिठाकर समझाया, "मित्र! तुम्हें बिना आवश्यकता के सब चीजें नहीं खरीदनी चाहिए। जो भी पैसे मिलते हैं, मेरी तरह तुम भी उन पैसों से अपनी पढ़ाई के लिए सामान खरीद सकते हो।"
अपनी माँ को दु:खी और परेशान देखकर साहिल को अहसास हुआ कि उसने जो फ़िजूलखर्ची की है, वह भी मांँ के परेशान होने का एक कारण है। 

संस्कार सन्देश-
फिजूलखर्ची करना बुरी आदत है। हमें अपने धन को सोच-समझकर खर्च करना चाहिए।

लेखिका-
शिखा वर्मा (इं०प्र०अ०)
उ०प्रा०वि० स्योढ़ा, बिसवाँ
जनपद-सीतापुर
कहानी वाचक-
नीलम भदौरिया
जनपद- फतेहपुर

✏️ संकलन
📝टीम मिशन शिक्षण संवाद
नैतिक प्रभात

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