कविता दिवस

अनकहे कुछ अल्फाज रह जाते हैं,

कविता बन वही पन्नों पर उकर आते हैं।

लफ्जों का जादू जग में छा जाता है,

हँसते खिलखिलाते शब्द दिल में उतर जाते हैं।।


कविता है बिंदी समान माथे का सितारा,

इसमें हम कह सकते हैं अपना भाव सारा।

कुछ ऐसा एहसास जो व्यक्त नहीं कर सकते,

कविता फिर देती हमें अपना ही सहारा।।


शब्दों का जादू होता विचारों का सागर,

कविता भर देती सखे गागर में सागर।

उस पर लेखनी का साथ गजब ढाता है,

यह अविरल धारा जिसका रुकता नहीं सफर।।


मैंने कोशिश की कविता को जीने की,

इसके हर एक मर्म को समझने की।

आज भी इसी के मायाजाल में उलझी हूँ,

हसरत नहीं त्यागूँगी भावों को उकेरने की।।


बच्चों को अपनी बात समझाने का तरीका है,

मैंने अब तक इससे इतना ही सीखा है।

प्रतिक्षण इसमें अपने आपको खोकर रहना है,

प्रयास करना मैंने अपने बड़ों से ही सीखा है।। 


रचयिता
नम्रता श्रीवास्तव,
प्रधानाध्यापिका,
प्राथमिक विद्यालय बड़ेह स्योढ़ा,
विकास खण्ड-महुआ,
जनपद-बाँदा।


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