क्या से क्या हो गयी जिंदगी

क्या से क्या हो गयी जिंदगी।
कि हमसे खफा हो गयी जिंदगी।।

हमने चाहा था शिद्दत से उसको।
फिर क्यों बेवफा हो गयी जिंदगी।।

जब दवाओं से काम न चला दोस्तों।
तब दुआ सी हो गयी जिंदगी।।

एक निगाह जो डाली तुमने मुझ पर।
तो और खुशनुमा हो गयी जिंदगी।।

कभी दुलारती है तो कभी डाँटती भी है।
मेरी माँ जैसी हो गई जिंदगी।।

यादों के समंदर में ढूँढ़ता हूँ उसे डूबकर।
क्या जाने सीप या मोती हो गई जिंदगी।।

कभी थी जो सवेरे की ताजगी लिए।
बोझिल दोपहरी सी हो गई जिंदगी।।

न जाने कहाँ उसकी मंजिल है।
अनजाना सा एक सफर हो गयी जिंदगी।।

रचयिता
प्रदीप कुमार चौहान,
प्रधानाध्यापक,
मॉडल प्राइमरी स्कूल कलाई,
विकास खण्ड-धनीपुर,
जनपद-अलीगढ़।

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