चले पुरवैय्या

झूमि झूमि के चलै पुरवैय्या।
बोलि बोलि के उड़ै चिरैय्या।
बूँद बूँद जल बरसावैं बदरा,
भीगि गयो है तन मन सगरा।
जल उबरायो बहिकै आयो
भरि गये सब ताल तलैय्या।
     झूमि झूमि के चलै पुरवैय्या।
मेंढक बोलैं जुगुनू चमकैं,
रतिया में दामिनि दमकै।
देखा जो कुम्हरैय्या तलैय्या
तैरति जल केरी चिरैय्या।
    झूमि झूमि के चलै पुरवैय्या।
धान लगावन खेत बनाए,
लै लै विरवा उनके रोपाए।
तन पर बरसति सगरा पानी,
कहति लगाइति हम तौ लैय्या।
        झूमि झूमि के चलै पुरवैय्या।
हरे भरे तरु की शोभा छाई,
टप टप बरसति भूमि जुड़ाई।
तिनका हरियाए सब हैं भैय्या,
हरी भरी होइगै धरती मैय्या।
       झूमि झूमि के चलै पुरवैय्या।
बदरा के आए सुख सब छाए,
खेत बाग वन सब भीगे नहाए।
प्रकृती में बाजति हरष बधैय्या।
      झूमि झूमि के चलै पुरवैय्या।

रचयिता
सतीश चन्द्र "कौशिक"
प्रधानाध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय अकबापुर,
विकास क्षेत्र-पहला, 
जनपद -सीतापुर।

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