एक अकेला काफ़ी है

दृढ़ संकल्प अगर हो मन में,
एक प्रयत्न ही काफ़ी है।
गंगा को धरती पर ला दे,
एक भगीरथ काफ़ी है।
अगर चले न साथ कोई भी,
एक अकेला काफ़ी है।
झुण्ड भेड़ियों का कितना हो,
एक सिंह ही काफ़ी है।
लाख कायरों की भीड़ में,
एक वीर ही काफ़ी है।
मर्यादा की बात करें तो,
एक राम ही काफ़ी है।
भाई की गर बात करें तो,
एक भरत ही काफ़ी है।
अपनों के भी भेद खोल दे,
एक विभीषण काफ़ी है।
सत्यवादिता की मिशाल दें,
एक हरिश्चंद्र काफ़ी है।
चुगली करने की खातिर तो,
एक मंथरा काफ़ी है।
अबला की रक्षा की खातिर,
एक जटायू काफ़ी है।
नारी का अपमान जो कर दे,
एक दुशासन काफी है।
धर्म युद्ध में विजय दिला दे,
एक कृष्ण ही काफ़ी है।
शिक्षा के उत्थान की खातिर,
एक मिशन ही काफ़ी है।
शिक्षक के सम्मान की खातिर,
एक 'विमल' ही काफ़ी है।
भटके हुए पथिक को उसका
पंथ दिखाना बाकी है,
सही रास्ते पर लाने को,
एक अकेला काफ़ी है।

रचयिता
ओमकार पाण्डेय,
सहायक अध्यापक,
उच्च प्राथमिक विद्यालय किरतापुर,
विकास क्षेत्र-सकरन,
जनपद सीतापुर।

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