35/2026, बाल कहानी- 27 फरवरी
#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 35/2026
*27 फरवरी 2026 (शुक्रवार)*
#बाल_कहानी- #समय_की_फिसलन
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प्राचीन समय की बात है, एक गुरुकुल में एक अत्यन्त प्रतिभाशाली लेकिन थोड़ा आलसी शिष्य रहता था। वह हमेशा कहता, "गुरुजी! कल से मैं अपनी साधना और पढ़ाई में जी-जान लगा दूँगा।" गुरुजी जानते थे कि 'कल' कभी नहीं आता।
एक सुबह गुरुजी उसे नदी के किनारे ले गये, जहाँ चमकदार सुनहरी रेत फैली थी। उन्होंने शिष्य की दोनों हथेलियाँ जोड़कर उसमें खूब सारी रेत भर दी और एक चुनौती दी,
"पुत्र! तुम्हें यहाँ से उस सामने वाले ऊँचे टीले तक दौड़ना है। शर्त यह है कि तुम अपनी मुट्ठियाँ बन्द नहीं कर सकते। तुम्हें हथेलियाँ खुली रखकर ही दौड़ना होगा। टीले पर पहुँचने के बाद तुम्हारी हथेली में जितनी रेत बचेगी, मैं तुम्हें उतना ही बड़ा उपहार दूँगा।"
शिष्य बड़े उत्साह से दौड़ा। शुरुआत में उसकी हथेलियाँ रेत से लबालब भरी थीं। लेकिन जैसे ही उसने दौड़ना शुरू किया तो हवा के झोंकों और दौड़ने के झटकों से रेत के कण किनारों से गिरने लगे। उसने देखा कि उसकी हथेली आधी खाली हो चुकी है। वह डर गया और अपनी गति धीमी कर ली ताकि रेत न गिरे, लेकिन रेत फिर भी धीरे-धीरे नीचे गिरती रही। जब वह टीले के करीब पहुँचा, तो उसने महसूस किया कि रुकने या धीमे चलने से रेत गिरना बन्द नहीं हुआ, बल्कि उसने केवल अपना लक्ष्य तक पहुँचने का समय गँवाया है।
जब वह टीले की चोटी पर पहुँचा, तो उसकी हथेलियाँ पूरी तरह खाली थीं। वह निराश होकर बैठ गया और रोने लगा, "गुरुजी! मैं हार गया। मैं रेत को बचा नहीं पाया।"
गुरुजी उसके पास आये और बड़े प्रेम से बोले, "पुत्र! दु:खी मत हो। यह रेत ही तुम्हारा 'समय' है। तुम चाहे दौड़ो, चाहे धीरे चलो या एक जगह रुक जाओ, यह रेत (समय) तुम्हारी हथेलियों से फिसलेगी ही। इसे रोकने का कोई तरीका इस ब्रह्माण्ड में नहीं है।"
उन्होंने आगे समझाया, "तुम्हारी गलती यह नहीं थी कि रेत गिर गई। तुम्हारी गलती यह थी कि तुम रेत को गिरते देख डर कर रुक गए। यदि तुम पूरी शक्ति से दौड़ते, तो रेत तब भी गिरती, लेकिन जब तुम्हारी हथेली खाली होती, तब तुम मन्जिल के शीर्ष पर होते। जीवन भी ऐसा ही है। समय तो जायेगा ही, बस हमें यह सुनिश्चित करना है कि जब वह जाये, तो बदले में हमें हमारी मन्जिल (उपलब्धि) मिल चुकी हो।"
#संस्कार_सन्देश -
समय को बचाना असम्भव है, लेकिन समय का निवेश करना सम्भव है। हर बीतता सेकण्ड एक गिरता हुआ रेत का कण है, उसे व्यर्थ की चिन्ता में गँवाने के बजाय अपनी पूरी ताकत अपने लक्ष्य में झोंक देना ही बुद्धिमानी है।
कहानीकार-
#नरेन्द्र_नाथ_पटेल (स०अ०)
कम्पोजिट विद्यालय सुरहन, भदोही (उ०प्र०)
✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद
#दैनिक_नैतिक_प्रभात
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