31/2026, बाल कहानी- 23 फरवरी

#दैनिक_नैतिक_प्रभात - 31/2026
*23 फरवरी 2026 (सोमवार)*
#बाल_कहानी - #अन्न_का_महत्व
------------------------

मोनी और सोनी अपने परिवार के साथ विवाह में गयी थीं। दोनों ही बारहवीं कक्षा में पढ़ती थीं।
विवाह में दूल्हा-दुल्हन और वरमाला देखी। वे उन्हें उपहार देकर सपरिवार मंच से नीचे आ गयीं। 
प्राँगण में उन्हें उनकी सहपाठी भी मिल गईं। तीनों मिलकर पार्टी का आनन्द उठाने चली गयीं। माता-पिता भी सबसे मिलत-जुलते बफर में सम्मिलित हो गये। भोजन परोसते हुए मोनी ने अपनी प्लेट लबालब व्यञ्जनों से भर ली, लेकिन खाते समय वह आनन्द न मिला, जो घर पर मिलता था। मीन-मेक निकालते हुए प्लेट चुपके से पण्डाल के बाहर रख आयी। खाने की प्लेट छोड़कर वह जल्दी से मिठाई लेकर आते दिखी, तभी सोनी ने कहा, "तुमने इतना भोजन क्यों व्यर्थ बरबाद कर दिया मोनी?" तो उसने झट से कह दिया, "उसमें स्वाद नहीं था इसलिए छोड़ दिया।"
यह सुन उसकी सहपाठी और सोनी बोल पड़ी, "पर.. इस तरह भोजन फेंकना ठीक नहीं।"
मोनी को इन बातों से फर्क न पड़ा। उसने लापरवाही से कहा, "छोड़ो न, दाल-चाँवल तो रोज खाते हैं। चलो, मीठे का ही मजा उठाते हैं।"
इस बार मिठाई खाकर वह प्लेट उसी ओट में रखने झुकी तो उसकी आँखें फटी रह गई।
उसके फेंके भोजन को मैले-कुचले वस्त्र पहने एक गरीब बालक बड़े चाव से खा रहा था। मोनी को आश्चर्य मुद्रा में देख वह डरते हुए बोल पड़ा, "दीदी! यह भोजन मुझसे मत लेना, मैं कल से भूखा हूँ। मुझे कल भी भूखा रहना पड़ेगा।" 
तब मोनी ने कहा, "पर भाई! इसमें तो बिल्कुल भी स्वाद नहीं है। यह अच्छा नहीं है। तुम इसे मत खाओ।"
बालक ने कहा, "यदि इसमें स्वाद नहीं तो भी मेरा भूखा पेट भर जाएगा। मुझे तृप्ति मिल रही है। कल तक पेट भरा रहेगा और मैं यह सोचते हुए चैन से सो जाऊँगा कि आज के भोजन से कल की चिन्ता दूर हो जाएगी। मेरा पेट भरा हुआ सोचकर मैं खुशी मनाऊँगा।"
गरीब बच्चे की इन बातों को सुनकर मोनी की आँखें भर आयीं। उसे मन ही मन अपनी गलती का आभास हुआ और अन्न का महत्व समझ आया।
वह उस बालक की दशा और भोजन की प्लेट को निहारती उस जगह से निकलते हुए बहुत उदास हो गई। सोनी और उसकी सहपाठी भोजन कर चुकी थीं।
उसी जगह पर माता-पिता भी आ चुके थे। मोनी के उदास चेहरे को देख माँ ने पूछा, "क्या हुआ मोनी बेटा! तुम उदास क्यों हो?" तभी वह बोल पड़ी, "आज मेरी आँखें खुल गईं माँ! आप लोग ठीक कहते हो! अन्न का हर दाना हीरे-मोती की तरह अनमोल है। इसे व्यर्थ नहीं करना चाहिए। धरती पर किसान अन्नदाता है। धरती माता का वरदान है अन्न। आज से मैं कभी यह गलती न करूँगी।"
उसी क्षण वह दृढ़-संकल्प लेते माँ से सारी बातें बताते बोली।
सभी लोगों ने उसकी इस बात का समर्थन करते हुए मोनी से कहा, "जो हुआ, सो हुआ। आज से हम सब एक ही लक्ष्य बनाते हैं कि अन्न को व्यर्थ नहीं जाने देंगे। जितनी आवश्यकता हो, उतना ही सम्मानपूर्वक ग्रहण करेंगे।"
इन बातों को सुनते हुए पास खड़े एक समाजसेवी सज्जन निकट आ गये और मोनी की पीठ थपथपाते हुए बोले, "शाबास बच्चों! आप सबसे ही देश का भविष्य है। मुझे खुशी हो रही इस घटना से कि अन्न को व्यर्थ न जाने देने के लिए तुम सब जागृत हुए।"
कुछ देर बाद सब विदा हुए। तब विवाह समारोह से निकलते हुए, मोनी के चेहरे में खुशी और उल्लास दिखने लगा।

#संस्कार_सन्देश - 
अन्न मूक प्राण है। इसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।

कहानीकार- 
#अमितारवि_दुबे (पू०प्रा०)
छिपली शा० सुखराम नागे महाविद्यालय
तहसील- नगरी, जिला- धमतरी, 
छत्तीसगढ़  

✏️संकलन
📝टीम #मिशन_शिक्षण_संवाद 
#दैनिक_नैतिक_प्रभात

Comments

Total Pageviews