दशहरा का पर्व

प्राचीन समय की बात बताऊँ
एक कहानी मैं सुनाऊँ
थे एक दशरथ राजा
अयोध्या जिनकी थी प्रजा।

उनके थे चार पुत्र
राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न
थे बहुत आज्ञाकारी
और तीन माताएँ प्यारी।

राजा दशरथ ने कभी
किया था कोई प्रण
उसी को निभाने के लिए
कैकेयी ने माँगा वचन।

दिया राम को वनवास
जिसका समय 14 वर्ष
साथ में चले लक्ष्मण भैया
और संग में सीता मैया।

समय बीतता गया
वन ही धाम बन गया
फिर हुआ कुछ ऐसा
कि जीवन ही बदल गया।

लंका का था राजा रावण
दस सिर वाला रावण
लंकेश्वर भी कहलाये
राक्षस भी कहलाता रावण।

रावण की थी एक बहन
नाम जिसका शूर्पणखा
गयी घूमने एक दिन वन
लक्ष्मण को वहाँ देखा।

देखते ही हो गयी मोहित
करने लगी शादी की जिद
लक्ष्मण ने किया विरोध
फिर शुरू हुआ प्रतिरोध।

शूर्पणखा न मानी तो
क्रोध आया बड़ी जोर
नाक, कान काट दिए तो
हुआ जोर से शोर।

होते ही उस पर वार
हुई रक्त से लाल
देख उसका ये हाल
रावण हुआ बेहाल।

लेने बहन का बदला
किया कुछ विचार
पहुँचा साधु भेष में
सीता माँ के द्वार।

भिक्षा माँगी उसने
खींचा उनका ध्यान
आयीं सीता माता
देने कुछ दान।

मगर साधु भेष में
छुपा था धूर्त रावण
सीता मैया का पकड़ा हाथ
और कर लिया हरण।

भगवान राम ने किया युद्ध
सीता माँ को छुड़ाया
उसी दिन से आज तक
प्रतिवर्ष दशहरा मनाया।

जो आता हर साल
आश्विन होता मास
शुक्ल पक्ष में
दशमी तिथि होती खास।

दशहरा का पर्व
है सच्चाई का प्रतीक
असत्य पर सत्य की जीत
की बतायी जाती सीख।

हर्षोल्लास से सभी मनाते
पावन ये त्यौहार
पारम्परिक ये उत्सव
धार्मिक और मिलनसार।

जगह-जगह नाटक मंचन होते
जगह-जगह मेले भी लगते
रावण के पुतले फूँकते
खूब पटाखे बजते।

ऐसा दृश्य देखकर
सभी लोग हर्षाते
किसी का बुरा न करो
सीख यही सब पाते।

रचयिता
रीना सैनी,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय गिदहा,
विकास खण्ड-सदर,
जनपद -महाराजगंज।

Comments

  1. बहुत अच्छा

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  2. Aapki rachna bahut hi sundar hai.likhti rahiye.good job

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  3. कम शब्दों की रामायण में आधिक शिक्षा ।

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