मेरी अभिलाषा

मजबूरी के दलदल में फँसा बचपन।
देख यह स्थिति गमगीन हैं नयन।।

खेलने-कूदने, लिखने-पढ़ने की उनकी उमर।
इन नन्हों को न जाने लगे गयी किसकी नजर।।

कुछ को नसीब हैं आसमान के तारे।
और कुछ हैरत में हैं देख यह नजारे।।

माँ ने मुझे सिखाया कि मेहनत का होता मीठा फल।
पर यह न सोचा था कि ऐसा होगा आने वाला कल।।

सब शिक्षा और शोहरत को मानते थे सफलता का मंत्र।
पर इन बाल श्रमिकों का सर्वस्व श्रम तंत्र।।

उड़ने दो पसारने दो उनको भी पंख।
क्या पता कब ये जीत लें कोई नई जंग।।

निष्ठुर हाथो के जुल्मों से बचा लो।
कोई तो इनका खोता हुआ बचपन सँभालो।।

देख यह बाल स्थिति मौन मन मे रो रही हूँ।
आज चिंतित हो रही हूँ
आज चिंतित हो रही हूँ।।

सोचती हूँ करूँ मैं इन नन्हों के लिए कुछ काम।
दूँ इनकी जिंदगी को शिक्षा और ऐश्वर्य का आयाम।।

रचयिता
दीक्षा गुप्ता,
सहायक अध्यापक,
प्राथमिक विद्यालय-रैपुरा,
विकास क्षेत्र-मानिकपुर,
जनपद-चित्रकूट।

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